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बेवफ़ाई

जब दिल टूटता है

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Aakash Tiwaari


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सच्चा वैलेंटाइन ***आत्मकथा*** “Valentine Contest”

Posted On: 14 Feb, 2011  
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जनरल डब्बा में

75 Comments

रुला के चल दिए…..गज़ल

Posted On: 21 Feb, 2012  
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कविता में

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इलाहाबाद का वो इंसान होता है..(कविता)

Posted On: 8 Feb, 2012  
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कविता में

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जख्मो ने हंसाया…गज़ल

Posted On: 24 Sep, 2011  
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कविता में

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वेश्या नंबर…..13

Posted On: 22 Sep, 2011  
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Junction Forum में

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तेरी याद में…गज़ल

Posted On: 15 Aug, 2011  
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कविता में

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सत्याग्रह का अंत?

Posted On: 10 Jun, 2011  
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Junction Forum में

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हम भी”आतंकवादी कसाब”बनेंगे….

Posted On: 26 May, 2011  
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जनरल डब्बा में

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अब बलात्कार नहीं करूँगा -Jagran Junction Forum

Posted On: 24 May, 2011  
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Junction Forum में

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जख्मी दिल मेरा…..गज़ल

Posted On: 18 May, 2011  
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कविता में

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कातिल बन गया……गज़ल

Posted On: 2 May, 2011  
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कविता में

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

नमस्कार आकाश जी ! सबसे पहले तो मैं आपसे माफी चाहूंगी । आपकी सच्चाई जाने बिना ही मैं आपसे मज़ाक कर बैठी । शर्मिंदा हूँ ... सारा लेख पढ़ने के बाद सच्चाई समझ आई । बात गंभीर है । आपके जीवन में जो भी घटा है सचमुच दुखद है । में निरुत्तर हूँ पर इतना कहना चाहूंगी की आप अपनी मोहब्बत को अपनी हिम्मत बनाइये और जो आपकी अपनी आपसे चाहती थी वो करके दिखाइये ... कई बार हमें जब अपना कोई छोडकर जाता है तो सचमुच ऐसा लगता है की बस ज़िंदगी खतम । पर नहीं ।मेरा ही एक शेर है जो में यहाँ कहना चाहती हु ....... कोई मुझे कत्ल करता किसी की क्या मजाल थी वो तो मेरा खुदा ही था जो मुझसे रूठ गया ..... तो किसी को दोष मत दीजिये । होता वही है जो भाग्य मे लिख होता है ... आपने तो बहुत कोशिश की थी पर अगर संबंध नहीं जुड़ सका  तो आप दोषी नहीं । न ही कोई और ... आप मेरी बात से शायद सहमत न हो पर मैंने भी ऐसा ही कुछ खोया है

के द्वारा: tosi

के द्वारा: Rakesh

के द्वारा: Hemendra

प्रिय आकाश तिवारी जी, मैँने आपकी कहानी एक साल से पहले पढी थी और देखो ना आज 1 साल 6 महिने बाद उसी भावना के साथ पोस्ट कर रहा हूँ जैसा मुझे पहली बार पढकर FELL हुआ था। मैँ ऐसा इस लिए हो पाया है क्योकि मैने भी किसी से सच्चा प्यार किया है। यह बात तब की है तब मै स्कूल मे पढता था अब मै उन से दूर हूँ और दूर नही रह सकता। आपकी कहानी पढकर मेरा मन आप से मिलने का करता है फोन पर बात करने का करता है मैँ बाद मे और पोस्ट करूगाँ। मेरी भी हालात आपकी तरह खराब है बस आपसे मिलना चाहता हूँ। मै ठीक से सो नही पाता सोने के लिए नीँद की दवाईयाँ लेनी पडती है और पढाई करनी पडती है। PLEASE HELP ME!!! (मैँ डरा नही रहा हूँ मै तो सिर्फ और सिर्फ एक बार आपसे एक बार बात करना चाहता हूँ क्योकि मै आपको और आपने करीब पाता हूँ और शायद इस कलयुग मेँ ऐसे प्यार करने वाले ढुढने से भी न मिले.) sushant102wwe@yahoo.com

के द्वारा: SUSH

प्रिय आकाश भाई ..... नमस्कार ! जब मैं इस मंच पर नया -२ आया था तो आपसे ही मिलते जुलते विचार इस मंच पर रखे थे -उस समय मैं शायरी भी किया करता था ..... लेकिन एक तो उस समय मुझको कोई न जानने के कारण पढ़ता नहीं था और उपर से वोह लेख सोनिया गाँधी वाली इंग्लिश में था ..... फिर वैसे की कुछ विचार उपदेश सक्सेना ने रखे तो सभी ब्लागरो ने उनका इतना विरोध किया तो डर कर मुझको अपना वोह लेख डिलीट करना पड़ा ...... लेकिन जब जागरण ने यह मुद्दा उठाया है तो सभी की सोच में परिवर्तन हुआ है ..... इसलिए मैं इन बहुरूपियो का ज्यादा विश्वाश नहीं करता ..... आपकी सोच सराहनीय है और विचारधारा बिलकुल सपष्ट और सीधी है हमेशा की ही तरह ..... आपसे ऐसे ही उत्तम विचारों की आशा हम सभी को रहती है जिस पर की आप हमेशा की तरह से खरे उतरे है ..... इस लेख के लिए मुबारकबाद से भी कुछ ज्यादा हो तो वोही कहना चाहूँगा :) :( ;) :o 8-) :| :| 8-) :) ;) :( :o

के द्वारा: Rajkamal Sharma

प्रिय आर्यन ,आशा है राखी की आत्मा प्रेम की अतुल्य बेदी चड़ने के बाद अब मुक्ति मार्ग पर हो ,                                                    मै आज के युवाओ से कहना चाहूँगा की पहले अपनी प्रथमिकताओं से भली भांति परचित हो लें ...हर बात का एक सही वक्त एक सही मुमेंट होना चाहिये थोड़ा भी इधर उधर हुआ तो कई सारी सामाजिक भावात्मक समस्याएँ आ जाती हैं उदाहरण आपके सामने है ....कुछ भी गलत सही नहीं होता बस आप स्वयं के व्यक्तित्व को पहचाने ...प्राथमिकताओं को तौले फिर जीवन के प्रति कोई परिभाषा गढें....स्वयं की हत्या भावनाओ की हत्या से कही अधिक जटिल है लेकिन सुगम शब्द आज के परिवेश में बहुत प्रासंगिक भी नहीं ....व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है की माँ जीवन का सबसे अधिक मार्मिक पक्ष होता है जब हम उसके जाने के बाद लिये इस दुनिया को नहीं छोड़ते तो किसी तीजे के लिये जीवन त्यागने का निर्णय मै सही नहीं मानता ...हम एक बार उसे अनंत पीड़ा पहुंचा कर दुनिया में आते है दोबारा ऐसा करने का हमें कोई हक नहीं है .........................

के द्वारा: प्रखर मिश्रा

नमस्कार भाई जान उम्मीद करता हूँ आप खैरीयत से होंगे बाबा के आन्दोलन का मक्सद व्यक्त्तिगत नहीं था इसलिए जो लोग कहते हैं के बाबा का आन्दोलन फेल हो गया मैं उन से पुछ्ना चाहता हूँ के आन्दोलन के सफल हो जाने पर क्या सारा काला धन बाबा को मिल जाता या देश के आम जनता को लाभ होता। सत्याग्रह धैर्यपूर्वक किया जाना चाहिए था लेकिन ऐसा न कर हमने अपने पैर पर कुलहारी मार ली। मेरे विचार से सरकार कि गलती का फायादा हमें लेना चाहिए था बाबा कि यदि गिरफतारी हो जाती तो आज देश का नजारा कुछ और होता। रही बात बाबा के मारने वाली बात तो मैं इस बात से सहमत नहीं हूँ क्योंकि इतनी भीड़ के सामने यदि बाबा कि खरोंच भी आ जाती तो कयामत आ जाता। इतनी बडी बेवकूफी सरकार कर हि नही सकती थी। अभी भी कुछ नहि बिगड़ा है यदि हम सब अपने निज स्वार्थ को त्याग कर साथ हो जाए तो हम जरुर सफल हो सकते हैं। क्योंकि एकता में बडा बल होता है। क्या बाबा रामदेव के अलावा किसी के पीछे इतना जनसमर्थन जुट सकता है शायद नहीं तो निर्विवाद नेता मानने में आखिर दिक्कत किस बात की है। भगवा वस्त्र वाला है इसलिए बडी शर्म की बात है हमें भगवा रंग तो नजर आता हैं लेकिन दिल में छुपी भारत मां की मुहब्बत नजर नही आता। जहां तक मैं जानता हूँ साधु पैन्ट शर्ट नहीं पहनते। बाबा कि कमयाबी, दौलत तो नजर आता है लेकिन उनकी भारतीयता नजर नही आती। वैसे तो बाबा से ज्यादा दौलतमन्द लोग हैं और उनकी दौलत कैसी है ये जगजाहिर है।

के द्वारा: Abdul Rashid

आकाश तिवारी जी नमस्ते, आप जैसे भी पुरुष हैं ; इस दुनिया में - जानकर बहुत सुकून मिला -सुकून इस बात का सबसे ज्यादा है ; आप और आप जैसे यदि और लोग भी हैं.. तो.. आगे आकर ऐसी आवाज देंगें ; अर्थात 'बलात्कार" के खिलाफ एक सख्त आन्दोलन करेंगे - तभी अपने देश में - ऐसा सख्त कानून बन सकेगा ( जैसा कि आपने अपने लेख में चर्चित किया है ) - फिर हर व्यक्ति "बलात्कार " की सजा के " खौफ़' से भयभीत रहेगा , और कभी स्वप्न में भी " बलात्कार " करने की नहीं सोचेगा . आप जैसे पुरुष ...क्या ..महापुरुष ही साबित होंगे ..यदि ऐसा सफल प्रयास कर सकें . आपके इस सफलतम प्रयास से -आप अपनी, तथा सभी की बेटियों, बहनों ,पत्नी और मां की - तन- मन से सुरक्षित कर पायेंगें - जिससे कि आप सदा सभी कि दुवाओं / आशीषों से सुशोभित होते रहेंगे और आपका यश चारों दिशाओं में फैलेगा . बहुत - बहुत धन्यवाद. मीनाक्षी श्रीवास्तव

के द्वारा: Meenakshi Srivastava

प्रिय राकेश भाई बहुत ही गंभीर मन को छू लेने वाला ये आलेख आप का इसका जबाब देना बहुत मुश्किल काम है हालत ही बयां करते हैं जबाब को कौन सी परिस्थिति में क्या होता है ये समाज है इस में लाज है मान है मर्यादा है हर घर परिवार की कुछ अपनी इज्जत अलग मान है सब के ख्वाब कुछ अलग होते हैं सब अपने बेटे बेटियों के लिए कुछ अलग सोच रखते हैं और चाहते हैं की उनकी संतान कुछ उन्हें भी माने जिसके लिए वे इतने दिन मरे हैं जियें हैं पल भर में सब मर्यादा धुल धूसरित न कर दे कहीं कहीं माँ बाप दिल को मन भी लेते हैं तो ये कडवा समाज उन्हें जीने नहीं देता बेटी भाग गयी उनके साथ कह देता है मुंह काला हो जाता है बहुत कुछ है आकाश जी फिर भी ये लेख प्रेम की कहानी बहुत ही प्यारे और संजीदा ढंग से वर्णित कर सका -प्यार जुर्म नहीं इसे मानना चाहिए हाँ कोशिश हो की दोनों पक्ष सहमत हो जाएँ प्यार ये प्यार आजीवन बना रहे मुझे आपसब से जवाब चाहिए………….हिन्दुस्तान में सच्चे प्यार को राधा कृष्ण से जोडकर नहीं बल्कि अपराधियों की तरह देखा जाता है…..क्या हमारा प्यार गलत था…क्या हम गलत थे अगर प्यार करना गलत है तो उखाड़ फेको राधा-कृष्ण की मूर्तियों को…….समाज का दोगला चरित्र है ये…..एक तरफ राधा कृष्ण को एक साथ पुजते है और दूसरी तरफ दो दिलों को जुदा करते है… शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा: surendr shukl bhramar5

आकाश जी नमस्कार -हंसा हंसा आप ने सुंदर व्यंग्य की चटनी चटा दी -लगता है आप को भेजना पड़ेगा संसद में जहाँ जा एक दिन आप संसद को संबोधित करेंगे और उन्हें सम्मोहित कर अपना कानून बदलवाने में सक्षम होंगे ताकि ये देश अपने नाम के लिए सब नियम नीति की धज्जी न उडा दे -पुराने घिसे पिटे कानून में तबदीली करे और आदमी की जान रहते रहते उसे निर्णय और न्याय दिखा सके - भाई ये भारत है यहाँ पर मुझे फांसी पर तो लटकाया नहीं जाएगा यहाँ बहुत सी पार्टिया है कोई न कोई तो मेरे पक्ष लेकर लडेगा ही..ऐसे ही कुछ साल बीत जायेंगे जहा मै चूरन और समोसे की चटनी नहीं खरीद सकता था वही मुझे करोडो में पाला जायेगा यही होता रहा दो टके की जांच के लिए करोड़ों बहा देना और हमारी जनता को भूखे मार देना -क्या पागलपन है शुक्ल भ्रमर ५

के द्वारा: surendra shukl Bhramar5

के द्वारा: वाहिद काशीवासी

प्रिय आकाश भैया प्रणाम अपने मेरा ब्लॉग पढ़ा और अपने स्वर्णिम सुझाव से अवगत कराया भैया वोइसे भी आज अगर आपकी और ......दीदी की प्रेरणा ना होती तो सायद ही मै कुछ लिख पाता आपकी वो एक आत्मकथा ने मेरी जीवन शैली को बदल कर रख दिया इस बदलाव के लिए आपका सहृदय धन्यवाद् और आभार भैया मै अपने पेज से आपलोगों को रेपली नहीं कर पा रहा कारन की पहला तो वहाँ हिंदी आप्शन नहीं मिल रहा और दूसरा अगर किसी तरह लिख भी देता हु तो सैंड करते समय invalid कोड शो करता है आप से मदद की आशा है भैया और अप्प कैसे है भैया ?अप्पके no.सायद बंद है सो आपका हाल चाल भी नहीं जान पा रहा हूँ खैर आप अपना धयान रखियेगा धन्यावाद आपका विनीत सुप्रिय

के द्वारा: supriyo

प्रिय आकाश भैया प्रणाम आपका नया पोस्ट पाकर बहुत ख़ुशी हुई और आपके ब्लॉग में अपना नाम देखकर मै सायद निरुत्तर सा हो गया हु की मुझे अप्पने इतना लायक समझा वरना हम तो डाली से टूटे पत्ते है  और भैया दुनिया मे अपनाऔर गैर कोय नही होता हम जिस लडकी से विवाह करते है उससे  कोय रक्त संबंध नही होता पर वो हमारी सबसे ज्यादा केयर करती है  क्योकि "in heart relation there is no logic only magic"so in my opinion heart relation is so great then blood relation और भैया मेरे नाम के साथ श्री और जी शब्द ना लगाइये मै आपका भाई हूॉ ऩा  और ना आप सा महान हू और भैया मैनाम तो नही लूगां पर मेरा पहला व्लाग दो देवात्मा को समर्पित होगा  धन्यवाद भैया अपना ख्याल ऱखिेगा और नया पोस्ट पाने की आशा के साथ शुभ रात्री आपका विनित सुप्रिय

के द्वारा: supriyo kumarsaha

प्रिय आकाश भैया प्रणाम आपका नया पोस्ट पाकर बहुत ख़ुशी हुई और आपके ब्लॉग में अपना नाम देखकर मै सायद निरुत्तर सा हो गया हु की मुझे अप्पने इतना लायक समझा वरना हम तो डाली से टूटे पत्ते है  और भैया दुनिया मे अपनाऔर गैर कोय नही होता हम जिस लडकी से विवाह करते है उससे कोय रक्त संबंध नही होता पर वो हमारी सबसे ज्यादा केयर करती है क्योकि \\"in heart relation there is no logic only magic\\"so in my opinion heart relation is so great then blood relation और भैया मेरे नाम के साथ श्री और जी शब्द ना लगाइये मै आपका भाई हूॉ ऩा और ना आप सा महान हू और भैया मैनाम तो नही लूगां पर मेरा पहला व्लाग दो देवात्मा को समर्पित होगा धन्यवाद भैया अपना ख्याल ऱखिेगा और नया पोस्ट पाने की आशा के साथ शुभ रात्री आपका विनित सुप्रिय

के द्वारा: supriyo kumarsaha

अंत में मै सिर्फ इतना कहूँगा होली का त्यौहार आपसी द्वेष को,पुरानी दुश्मनी को मिटा कर एक दुसरे को प्रेम से गले लगाने का त्यौहार है…पूरे साल हमारे द्वारा बोले गए कडवे शब्दों को मिठास में बदलने का त्यौहार है…इस त्यौहार की मिठास को बनाये रख्खे…इस त्यौहार पर गुझिया और ठंडई का मजा लेना चाहिए न की शराब का….होली पर शाम को एक दुसरे के यहाँ जाकर गले मिलना चाहिए…होली के दिन हमारे द्वारा छोटा सा प्यार भरा प्रयास समाज को बहुत ही खुशहाल बना सकता है….इसी उम्मीद के साथ ….. प्रिय आकाश जी कितनी सुन्दर पिचकारी , कितने शोख रंग , व सुकून भरी फुहारों की शीतलता, मन की क्यारी जैसे खिल उठी | होली पर ये भावनाए ये विचार बाट कर हम सब इस त्यौहार का मजा दुगुना कर सकते है | बधाई

के द्वारा: Ramesh Bajpai

श्री राजकमल जी, पहली बात तो आप ये कहना बंद कर दीजिये की मैंने आप पर कोई एहसान किया है..दूसरी बात मैंने आप का लेख पढ़ते ही तुरंत एक पोस्ट ब्लॉग पर डाली ...आप उस पोस्ट को देखेंगे तो पायेंगे की बहुत ही कम प्रतिक्रिया आई है ऐसा क्यों ...मै एक बात बहुत ही स्पष्ट कह देना चाहता हूँ यही है हिन्दुस्तान जब वक्त आता है तो साथ में कोई नहीं दिखता..ऐसे ही किसी विषय को लेकर क्रान्ति नहीं हो सकती...सिर्फ लिख देना ही बड़ा नहीं होता कुछ कर दिखाना चाहिए,..मै एक पत्रकार का बेटा हूँ मेरे पिता कभी किसी के दबाव में नहीं आये और मै खुद कभी किसी के दबाव में नहीं आना चाहता हा मगर सच्चाई के लिए....अब यहाँ मै आपको सही मानू या फिर जे.जे. को मुझे यही समझ में नहीं आ रहा.. इसलिए मै इस विषय को यही खत्म करना चाहता हूँ और आपसे भी यही निवेदन करूँगा .....आगे की देखिये...आप अगर सही है तो मुझे नहीं लगता की आपको स्पष्टीकरण देना चाहिए..मुझे कहीं-कहीं पर आपके जवाब बहुत झल्लाहट वाले दिखे.....एक हास्य/व्यंग के रचनाकार को तो इतना गुस्सा आना ही नहीं चाहिए.... इसलिए मै पुनः आपसे निवेदन करता हूँ की इस विषय पर प्रतिक्रिया का दौर खत्म कीजिये...जिसको जो कहना है कहने दीजिये... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

प्रिय आकाश भाई ......नमस्कार ! आपने मेरे साथ दिया उसके लिए मैं आपका एहसानमंद हूँ ..... शायद मेरे अकेले की आवाज सुनी भी ना जाती ..... लेकिन हमेशा की ही तरह आपका साथ और आपकी मेहनत रंग ले आई ..... आज सपष्ट हो गया की जागरण जंक्शन की नज़र में आपकी कितनी अहमियत है ...... और हम लोग तो कठपुतलिया मात्र है , यह बात इसी से साफ़ हो जाती है की अपनी एक हफ्ते बाद वाली नीति को बदलते हुए , मेरे उस लेख को जागरण ने तीसरे दिन ही तप टेन में डाल दिया ताकि मैं उसको डिलीट ना कर सकूं और उनका पक्ष सारे जान ले ...... जब वोह हमारी कई बाते मान लेते है तो मैंने भी उनकी इसी मानसिकता का पहले से ही अनुमान लगाए हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों तक उनकी बात पहुंचाने के मकसद से अपने ब्लाग पर उनको दिया हुआ जवाब आपके ब्लाग पर भी पेस्ट किया था ....... खैर मैं उनके प्रयास को सकारात्मक रूप में देखता हूँ की अब शायद ही किसी ब्लोगर को मेरे जैसी समस्या से दो चार होना पड़े ..... लेकिन कुछेक ब्लागर भाईयों के मन में ही नहीं बल्कि कलम से भी जो शंका झलकती है उससे मन दुखी हो करके ना चाहते हुए भी यह कामना करने लगता है की ऐसी समस्या दो चार ब्लागरो को पेश आ ही जाए , शायद तभी उनको यकीन आएगा और इसकी गंभीरता का यकीन होगा ..... शायद हम लोग जल्दबाजी कर गए , अगर इंतज़ार करते तो उसकी असली मंशा का पता चल जाता की आखिर वोह क्या चाहता है .... लेकिन दूसरी तरफ यह सोच भी उभरती है की ऐसे लोगों की सोच सिथर और परिपक्व नहीं होती ,इनका कोई भरौसा नहीं होता की कब क्या कर दे , इसलिए इनको ऐसा मौका ना देकर अच्छा ही किया ..... अंत में यही कहूँगा की मझे नाज़ है आप जैसे दोस्त पर , काश की कोई लड़की भी मेरी ही तरह आपसे ऐसा कह दे , इसी कामना के साथ आपका आभारी

के द्वारा: Rajkamal Sharma

जागरण जंक्शन ब्लॉग के आदरणीय सदस्यगण .....सादर अभिवादन ! जैसी की आशा थी , आपका जवाब मिला , जिस प्रकार आपके लिए इस मंच की प्रतिष्ठा मायने रखती है , उसी प्रकार हम ब्लागरो के लिए भी रखती है ..... जब भी मुझको या किसी और को कोई भी दिक्कत होगी तो वोह अपनी समस्या को ब्यान करेगा , उसके तरीके अलग -२ हो सकते है हर किसी की अपनी -२ समझ के अनुसार ...... हममे से ज्यादातर का यही सोचना और मानना है की फीड बैक पर हमारी कोई सुनवाई नही होती , इसलिए ब्लाग लिखने का सहारा लिया जाता है ...... हम यह भलीभांति जानते है की हरेक तरह की सक्रियता पर आपकी पैनी नजर रहती है ..... लेकिन हम लोग तो आपके द्वारा दिए गए जवाब को ही इस बात का आधार और पैमाना मानते है की हमारी बात आप तक पहुँच गई .... मैंने जो अपनी बात समस्या के रूप में आपके और सभी ब्लागरो के सामने रखी , मुझ पर विश्वाश और स्नेह के नाते दूसरे ब्लागरो ने उसको सच मान कर विश्वाश किया ..... मैं नही समझता की कोई किसी के विश्वाश का इस तरह बेजा इस्तेमाल करेगा ...... आपने जो अपनी तहकीकात में मेरी उस शिकायत को निराधार पाया है , उस पर मै इस मंच की प्रतिष्ठा और दूसरे ब्लागरो के विश्वाश और इस मंच पर उनके भविष्य के मद्देनजर विश्वाश करने पर मजबूर हूँ ..... सच्चाई जो भी रही हो , उसको आप और मैं जानते ही है ...... इसके साथ -२ हम सभी में यह विश्वाश पैदा हुआ है की आगे हम में से किसी के भी साथ कोई भी ऐसी या वैसी समस्या पैदा नही होगी ....... हमारे द्वारा लिखे जाने वाले ब्लाग अब हमारी नही बल्कि इस मंच और समाज की अमानत है .... यह सच है की उस समय मैं अपने ब्लाग को डिलीट करना चाहता था , लेकिन अब नही .....उसके लिए मैंने डैशबोर्ड में डिलीट ब्लाग का इस्तेमाल किया था .... जहाँ पर की मुझको यह लिखा हुआ मिला था की अब मैं भविष्य में दुबारा कभी भी इसी नाम से ब्लागिंग नही कर सकूंगा ...... ओके क्लिक करने पर इमेल द्वारा सूचित करने की लाइन पढ़ने को मिली थी ...... यदि जीमेल द्वारा मुझको आई.पी. एड्रेस सहित मेरा खाता किसी दूसरे के द्वारा देखे जाने की मेल , मेरे द्वारा गलती से डिलीट नहीं हुई होती तो आपको भी तहकीकात में सहूलियत होती ...... आपके द्वारा समस्या के निवारण के लिए किये गए प्रयासों औए भविष्य में उनकी पुनरावर्ती रोकने के लिए किये गए प्रयासों की मैं सराहना करता हूँ और आपका आभार प्रकट करता हूँ ...... इसके इलावा मुझे और कुछ नही है कहना ...... राजकमल शर्मा

के द्वारा: Rajkamal Sharma

श्री राजकमल जी, किस बात का कर्जदार...मैंने तो वही किया जो मेरा फर्ज था.एक जिम्मेदार नागरिक और एक जिम्मेदार ब्लोगर के नाते मुझे गलत चीजों के लिए आवाज उठानी चाहिए सो मैंने किया....और जब बात अपनों की हो तो फिर मैदान में खुलकर तो आना ही पड़ता है.....श्री राजकमल भाई अगर जागरण की तरफ से अलग से या फिर मेरे इस पोस्ट पर या फिर आपके पोस्ट पर इस समस्या के सम्बन्ध में अगर कोई जवाब नहीं आया तो मै जागरण जंक्शन पर ब्लोगिंग करना छोड़ दूंगा...क्योंकि हमारी गलतियों पर इनकी नजर तुरंत पड़ती है....मगर जब ऐसा कुछ गलत हुआ है तो दो दिन बीत गए कोई स्पस्टीकरण नहीं आया..इस गैर जिम्मेदाराना माहौल में मै तो नहीं रह सकता... आपका आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

प्रिय आकाश भाई .....सस्नेह नमस्कार ! आपने और मैंने बाकि के ब्लोगर साथियो के साथ इस मंच पर ना जाने कितने ही मुश्किल हालातों का सामना कियाथा , तब भी हमने डट कर नापाक इरादे वाले नीच और नराधम लोगों का सामना किया था .....पहले दुश्मन सामने था लेकिन इस बार वोह मेरे खुद के ही भीतर कहीं समा गया था .... लेकिन सभी पासवर्ड बदल लिए जाने के कारण अब शायद उसकी पहुँच मेरे तक ना रह गई हो ..... आपने पहले भी कई बार अपना रोष लेख लिख के जतलाया है और मेरा साथ दिया है ..... इतना बवाल खड़ा हो गया + इतना हो हल्ला मच गया ..... यूँ कहिये की इस मंच पर एक ऐसी आंधी आई की जिसको आपके साथ और सहयोग ने बवंडर में बदल दिया ..... यदि अभी भी हम सोचे की जागरण चुप है तो यह हमारी गलतफहमी होगी .... हमारे इन सामूहिक प्रयासों के फलस्वरूप अब उनको इस मंच पर अति उन्नत तकनीक इंस्टाल करनी ही होगी .....इसलिए मुझको नहीं लगता की अब भविष्य में किसी भी ब्लोगर के साथ ऐसी किसी भी प्रकार की समस्या आएगी ....यदि फिर भी किसी समस्या से दो चार होना पड़ा तो हम सभी के लिए विकल्प खुले है ...... आप के द्वारा दिए गए इस अनमोल सहयोग से मैं अभिभूत हूँ ....आपने मुझको अपना कर्जदार बना लिया है .....मैं उम्मीद करता हूँ की मेरी अगली किसी पोस्ट पर पहला कमेन्ट आपका ही होगा .... आपका दिल की सभी गहराइयों से आभारी

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: allrounder

आदरणीय श्री शाही जी, जब भी आपकी इतनी लम्बी प्रतिक्रिया देखता हूँ दिल गदगद हो जाता है... आपको मेरी ये फोटो अच्छी लगी जानकार हर्ष हुआ..मगर मै इसे बदलकर फिर से वही पुरानी फोटो लगाऊंगा... जैसा की नीचे श्री राजकमल जी ने कहा की अब सुधार नहीं हो सकता तो क्या मै ये मानू की ये फिर से उसी असफल सरकार को अपनाएंगे..और उसी गंदी व्यवस्था के साथ जीने में कोई दिक्कत नहीं होगी...मै ये मानता हूँ की मै या आप अकेले कुछ भी नहीं कर सकते मगर क्या यहाँ जागरण के मंच पर आपको ऐसा जवाब सही लगता है...क्या हमें एक इकाई बनाकर आगे नहीं आना चाहिए..और जागरण को इसमें मदद भी करना चाहिए.. प्रतिक्रिया के लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया.. क्षमा सहित... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आकाश जी, सबसे पहले तो नई फ़ोटो की बधाइयां स्वीकार करें । आपकी गमछे वाली फ़ोटो किसी अल्हड़ किशोर का आभास दे रही थी । बीच में किसी समय आपकी दाढ़ी वाली फ़ोटो भी एकाध दफ़े देखने को मिली थी, जो फ़कीरचन्द जोगिया बैताल से मिलती जुलती थी । उस फ़ोटो के समय की आपकी मन:स्थिति अब समझ में आती है । यह एक असली युवा और परिपक्व ब्लागर की फ़ोटो है, जो एक परिपक्व विचार से भरे लेख के साथ ही आई भी है । बधाई । जहांतक हम सभी के ग़द्दार और भ्रष्ट होने की बात है, तो इसमें कहां संदेह है । अनैतिकता और भ्रष्टाचरण पूरे देश के लहू में घुल चुका है, और हम सभी इसके एडिक्ट हो चुके हैं । अभी आज ही मैंने किसी मित्र की प्रतिक्रिया के जवाब में लिखा भी था कि यदि हमें एकाएक किसी क्रांतिकारी बदलाव के फ़लस्वरूप भ्रष्टाचार मुक्त भारत मिल भी जाय, तो शायद विशुद्ध देसी घी की तरह हम उसे भी एकाएक पचा नहीं पाएंगे । क्योंकि हमारा हाज़मा भ्रष्टाचार की खुराक़ के साथ एडजस्ट हो चुका है । राजा प्रजा सबकी मुख्य धारा वही हो चुकी है, जो किसी गन्दे नाले की होती है । लेकिन यह कैन्सर का अंतिम स्टेज है, जिसके बाद या तो आपरेशन से राष्ट्रीय अस्मिता की जान बच जानी है, या नहीं तो सदा सदा के लिये समाप्त हो जानी है, और कुछ वर्षों में ही ऐसा अराजक महौल हो जाने की सम्भावना बनेगी, जहां कोई किसी को पहचान पाने में भी असमर्थ होगा । अभी देखिये आप, राष्ट्रभक्तों और जनता की निरन्तर थुक्का फ़जीहत के बावज़ूद केंद्रीय सरकार की कार्यप्रणाली में किंचित मात्र भी बदलाव प्रतीत हो रहा है क्या ? अब भी चोर और भ्रष्ट नेताओं के बचाव में ही निर्लज्ज प्रधानमंत्री महोदय एवं उनकी मंडली व्यस्त दिख रही है । एक धड़े के समर्थन वापसी के तत्काल बाद एक और बेशर्म धड़े ने समर्थन की तैयारी करने की ठानी है, और पूर्व की भांति ही सौदेबाज़ी चालू है । जबकि कांग्रेस की इतनी हेठी के बाद यदि कोई नैतिकता वाली पार्टी है, तो उसे कांग्रेस से पल्ला झाड़ लेना चाहिये । राज्य का ही प्रमुख कर्त्तव्य होता है कि देश में सुशासन का स्वस्थ माहौल तैयार करे । सत्ता प्रमुख स्रोत होती है, जो यदि स्वच्छ है, तो नौकरशाही और जनता सहित सब कुछ सुधरने लगता है । बिहार इसका ज्वलंत उदाहरण है । हां, इनको सुधारने के लिये जनता को ही कमर कसना होगा । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय आकाश भाई ......नमस्कार ! क्या बात है बदले -२ से मेरे सरकार नजर आते है ! ********************************************************************** इमानदारी और देशभक्ति अब ढूंढे से भी नही मिलती है ...... भाई मेरे हमसे अपने अन्दर वाला भगवान तो खोजा नही जाता अपने अन्दर झाँकने की किसे फुर्सत है , हमे दूसरों की कमिया निकालने में ही असली मज़ा आता है ...... **************************************************************************************** दसवी क्लास में पढ़ा था :- we should have faith in the unity of india ......हमे यह नही देखना की भारत ने हमारे लिए क्या किया है ,बल्कि उसकी बजाय हमको यह देखना चाहिए की हम भारतवर्ष के लिए क्या कर सकते है ...... अपने चंद पैसे बचाने के लिए हम हंसी खुशी से गद्दार बनना पसन्द कर लेते है ..... वैसे आप के लेख से मैं कोई ज्यादा बदलने वाला नही हूँ ...... जब अंतरात्मा ही मर चुकी है तो क्या किया जा सकता है .... धन्यवाद

के द्वारा: Rajkamal Sharma

के द्वारा: md dilshad khan saudia

आकाश जी नमस्कार,भाई साहब प्यार में आपके साथ जो कुछ भी हुआ पर क्या कहा जाय लेकिन हाँ इतना जरुर कहा जा सकता है की आप और राखी ही ऐसे प्रेमी नहीं हैं इस धरती पर जिन्हें अपनी मंजिल नहीं मिली,कभी कभी स्थितियां कुछ भी करने पर मजबूर होती है,सबसे पहले तो राखी के द्वारा लिया गया फैश्ला शायद एक प्रेमी को सोभा नहीं देता और फिर बाद में आपका ये शादी न करने का प्रण,,,,,,भाई जिन्दगी लम्बी है जैसा की आदरनीय शाही जी ने अपने उच्च विचारों के माध्यम से समझाने का प्रयाश किया है की एक इन्शान की और भी जिम्मेदारियां होती है जिसे पूरा करना उसका परम कर्तब्य होता है,और फिर यहाँ आपको एक बात और ध्यान में रखना चाहिए की आपकी जानू ने आपसे कोई वादा भी किया है आपको कुछ बनना है तो इसका भी ध्यान रखना होगा आपको,,,,,,,,,,,,,,,,,और हाँ एक बात और कहना चाहूँगा ऐसी ही किसी बात पर किसी प्रबुध्ह ने ये कहा है की ....कभी किसी के लिए मत रो क्योंकि जिसके लिए तुम रो रहे हो वो तुम्हारा अपना नहीं है और वो जो तुम्हारा अपना होगा वो तुम्हे कभी रोने नहीं देगा....! बाकि अगर कुछ ज्यादा कह दिया होऊंगा तो छोटा भाई समझ कर माफ़ कर दीजियेगा,धन्यवाद!

के द्वारा: Dharmesh Tiwari

प्रिय आकाश आपको मेरी बात शायद बुरी लगे लेकिन किसी का आत्महत्या कर लेना प्यार नहीं दर्शाता सिर्फ एक निर्णय (वह भी गलत) लेने की क्षमता दर्शाता है| आप राखी की यादों से खुद को बाहर निकालिए और किसी भी तरह से स्वयं को कमजोर न महसूस करिए| ये मैं इसलिए नहीं कह रहा क्योंकि आप मुझे प्रिय हैं बल्कि इसलिए कह रहा हूँ क्योंकि आप साहसी हैं| क्षण भर का साहस दिखा कर मौत को गले लगाना प्यार नहीं बल्कि जीते हुए हर घडी संघर्ष करना और हर परिस्थिति का सामना करना जिसमे सिर्फ हार ही हिस्से में आती है इसे प्यार की जीत कहते हैं| आप कक्षा ९ के प्यार की बात करते है मैं तो समझता हूँ अभी भी आपको प्यार की समझ नहीं है| सदमों से बाहर निकलो !

के द्वारा: chaatak

श्री निखिल पांडे जी..अभी मैंने श्री पारीख जी से कुछ बाते शेयर की है आपसे भी करता हूँ.. जैसा की आपलोग चाह रहे है की मै शादी कर लूँ..और अपनी ज़िन्दगी को ख़ुशी-ख़ुशी जियूं.तो क्या ये सही है की एक अरफ एक लड़की जो मुझे बहुत प्यार करती थी मेरे लिए अपनी जान दे देती है और मै कायर की तरह आज भी जीना हूँ…क्या ये कम है की मैंने अपनी जान नहीं दी…क्या मै राखी के लिए छोटा सा बलिदान नहीं दे सकता…या फिर नहीं देना चाहिए…ये तो सरासर अन्याय होगा मेरे और राखी के प्यार में…प्यार तो एक बार ही होता है…शादी के बाद भले ही मुझे अपनी पत्नी के साथ रहने की आदत हो जाए मगर प्यार तो किसी भी शर्त पर नहीं हो सकता….कल को उसने कही खुद को राखी से कम्पेयर कर दिया तो मेरे लिए मरने जीने की बात हो जायेगी…क्योंकि इस धरती पर मेरे लिए केवल और केवल एक ही राखी थी वो मेरी जानू….आपसब ने मेरे बढे भाई का और सीनियर का फर्ज निभाते हुए जो भी सुझाव दिया वो कहीं से भी गलत तो प्रतीत नहीं हो रहा मगर..मेरी बातों पर जरूर गौर करें… आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आकाश जी आपकी कथा .. भावुक करने वाली है .. और आपके प्रश्न भी तार्किक है ..पर एक बार अपने आपको एक प्रेमी की स्थिति से हटाकर सोचिये आपके प्रेम की जरुरत पूरी दुनिया को है... जान देकर या ऐसा कोई भी कदम उठाकर आप अपने प्रेम को हरा देते ...दुनिया की नजरो में.. बड़ी चुनौती मर जाना नहीं होता बल्कि जीना होता है और वह भी पूरी शिद्दत के साथ जीना.. आप सबसे पहले एक इंसान है और और आपका सबसे पहला प्रेम आपका जीवन है क्योकि इसी से आप ईश्वर द्वारा दी गई जिम्मेदारियों को निभाते है.. हा अगर आपके जान देने पर ईश्वर या मानवजाति का कोई कार्य सिद्ध होता है मै आपको या किसी को भी जान देने की सलाह दूंगा.. लेकिन ये आप भी जानते है की ऐसा नहीं होता है.. जान देने से सर कष्ट होगा ,,राखी को , आपके माता पिता को और मित्रो को.. जीकर और इस जीवन को परमार्थ में लगाकर ये सिद्ध कर सकते है की आप अपने जीवन में एक सच्चे प्रेमी रहे है .. खोखले प्रेमी नहीं....विवाह करे और हमें भी आमंत्रित करे.. ये जीवन इतना अधिक सकारात्मक है.. जिसका आपको अंदाजा नहीं होगा.. शेष सारी बाते नीचे की टिप्पड़ियो में आपके वरिष्ठजन कह चुके है..... शुभकामनाये शुभकामनाये...

के द्वारा: NIKHIL PANDEY

श्री अरविन्द जी, जैसा की आपलोग चाह रहे है की मै शादी कर लूँ..और अपनी ज़िन्दगी को ख़ुशी-ख़ुशी जियूं.तो क्या ये सही है की एक अरफ एक लड़की जो मुझे बहुत प्यार करती थी मेरे लिए अपनी जान दे देती है और मै कायर की तरह आज भी जीना हूँ...क्या ये कम है की मैंने अपनी जान नहीं दी...क्या मै राखी के लिए छोटा सा बलिदान नहीं दे सकता...या फिर नहीं देना चाहिए...ये तो सरासर अन्याय होगा मेरे और राखी के प्यार में...प्यार तो एक बार ही होता है...शादी के बाद भले ही मुझे अपनी पत्नी के साथ रहने की आदत हो जाए मगर प्यार तो किसी भी शर्त पर नहीं हो सकता....कल को उसने कही खुद को राखी से कम्पेयर कर दिया तो मेरे लिए मरने जीने की बात हो जायेगी...क्योंकि इस धरती पर मेरे लिए केवल और केवल एक ही राखी थी वो मेरी जानू....आपसब ने मेरे बढे भाई का और सीनियर का फर्ज निभाते हुए जो भी सुझाव दिया वो कहीं से भी गलत तो प्रतीत नहीं हो रहा मगर..मेरी बातों पर जरूर गौर करें... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

प्रिय श्री आकाश तिवारी जी, यह दुखद वृतांत सुनकर दुख तो होना ही था। आदरणीय शाही जी ने जो कुछ लिखा उसे सभी की और से मान लीजिए। रही बात दोष देने की तो मेरा तो अब भी यही मानना है कि दोष किसी का भी नहीं हैं सिर्फ देखने का नजरिया अपना अपना होता है। देश, काल, समाज व परिस्थितियां के अनुसार कार्य होते व घटते है। पंडित है तो आप भी जानते है कि प्रारब्‍ध का लेख बदल नहीं सकता। आप अपने इस वृतांत में कई स्‍थानों पर दुसरों को दोष ना देने की बात लिख चुके हैं फिर भी किसी ना किसी पर दोष मढ़ना चाहतें हैं और उसकी आड़ लेकर अपने को कष्‍ट देना। लेकिन इससे क्‍या होना है। चाहे राखी का पत्र हो या आपकी मॉं का अथवा इस मंच के सभी पाठकों की टिप्‍पणियां हो कोई भी आपके स्‍वयं को कष्‍ट देनें की बात से संतुष्‍ट नहीं है। क्‍योंकि जीवन चलने का नाम है इसलिए बस इसे हंसी-खुशी जीना चाहिए। जो रात गई वह बीत गई अब आगे की सुधि लेनी चाहिए। शेष आप स्‍वयं समझदार हैं जो अच्‍छी रचनाएं रच रहें हैं तो इसे भी समझेंगें। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: Arvind Pareek

आकाश भाई, ज़िंदगी बेशक आपकी है तो फ़ैसला लेने का सर्वाधिकार आपके ही नाम सुरक्षित है । कोई चाहकर भी एक हद से अधिक अतिक्रमण नहीं कर सकता, अन्यथा मैं तो आज कह रहा हूं, संभवत: आपके परिवार वाले अभी तक न जाने कितनी बार आपको समझाने का प्रयास कर चुके होंगे । इतना जान लीजिये कि परमपिता की ओर से भी भावना के ऊपर कर्त्तव्य का स्थान दिये जाने का निर्देश मनुष्य जाति को प्राप्त है, क्योंकि मनुष्य सभी प्राणियों में श्रेष्ठ और परमात्मा का प्रिय पात्र रहा है । सवाल आपके अपने हृदय की भावनाओं का नहीं है, बल्कि सांसारिक कर्त्तव्य और मूल्यों का है, जिसके प्रति हर पुत्र को अपनी ज़िम्मेदारियों का निर्वाह करने हेतु परिवार और समाज के हित में स्वयं की भावनाओं का दमन कर समझौते करने पड़ते हैं । मात्र अपनी आकांक्षाएं पूरी करने के लिये यदि कोई मृत्यु का वरण कर ले, तो वह परिवार और समाज की नज़रों में कभी सम्मान का पात्र नहीं बन पाता । सामाजिक प्राणी होने के नाते हम ऐसे तमाम कर्त्तव्यों के साथ बंधे हुए होते हैं, जो हमारे दिल को मंज़ूर नहीं होते, परन्तु हमें करना ही पड़ता है, जन्म देने वाले माता-पिता की खुशियों के लिये, अन्य पारिवारिक सामाजिक नाते रिश्तेदारों की आकांक्षाओं के लिये भी । अंत में इस कर्त्तव्य निर्वाह में ही हमारी आत्मिक संतुष्टि भी सन्निहित है । ऐसा न कर हम अपने भीतर तमाम कुंठाओं को जन्म देते रहते हैं, जो कभी चैन की सांस नहीं लेने देतीं । वक़्त किसी भी घाव के लिये सबसे बड़ा मरहम होता है । हम इतनी देर कर दें कि बाद में फ़ैसले में होने वाली देर के लिये भी पछताना पड़े, किसी के लिये भी हितकर नहीं होता । आपका एक त्याग कितने सारे दिलों का सुकून वापस ला सकता है, ज़रा इसपर गौर करते हुए गम्भीर चिंतन करें, फ़िर कोई निर्णय लें तो उचित होगा । आपकी होने वाली पत्नी के भाग्य में होगा तो वह अपनी नि:स्वार्थ सेवा से आपका दिल जीतकर अपना प्यार प्राप्त कर ही लेगी । वैसे भी आप जैसा प्यार करने वाला इंसान निश्छल प्रेम के आगे बहुत देर तक अविचलित नहीं रह सकता । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय भाई आकाश जी, शुभाशीष । मैं आज आपकी जीवनी (अब इसे कहानी नहीं कह सकता, पवित्र भावनाओं का अपमान होगा) पढ़कर इतना विचलित हूं, कि पढ़ने के काफ़ी देर बाद टिप्पणी लिखने का साहस कर पाया हूं । मुझे विगत दिनों में आपको अपनी आत्मकथा लिखने पर ज़ोर डालने के क्षण भी याद आ रहे हैं, और मेरे दबाव पर आपकी चुप्पी और फ़िर असमर्थता जताया जाना भी याद आ रहा है, परन्तु उसके पीछे के आपके कारुणिक भाव को आज समझ पा रहा हूं । हो सके तो मुझे माफ़ कर दीजियेगा । अपने सीने में दर्द का तूफ़ान समेटे आपने बलपूर्वक हमारे साथ मित्र-धर्म का निर्वाह किया, और ज़बर्दस्ती मुस्कुराते रहे हैं, यह आप जैसे प्यार करने वाले इंसान के ही बूते की बात थी । धन्य हैं आप आकाश जी, हमें आप पर अत्यंत गर्व है, कि आप जैसा साथी हमारे बीच है । राखी ने अच्छा किया या बुरा, इसपर टिप्पणी करना उस हुतात्मा के साथ ज़्यादती होगी, परन्तु मर कर उसने यह संदेश तो समाज के सामने छोड़ ही दिया है कि इश्क़ पर ज़ोर नहीं चलता, और समाज को ऐसे मामलों में अत्यन्त गम्भीरता पूर्वक विचार करने के पश्चात ही कोई फ़ैसला लेना चाहिये । युवा मन में वास्तविक प्रेम प्रस्फ़ुटित होने के बाद फ़िर वह प्रत्येक रस्मोरिवाज और सामाजिक बंदिशों से ऊपर उठ जाता है । समाज को इस सच्चाई को स्वीकार करना ही चाहिये, अन्यथा हमेशा से ही ऐसे ही परिणाम ज़माने के सामने आए हैं, जैसा आपके मामले में हुआ है । इससे किसी को कुछ हासिल नहीं हो पाया, न राखी को, न आपको, और न ही दोनों परिवारों को । मिली है तो जीवन भर न भूल पाने वाली एक कसक, और शायद पश्चात्ताप की आग भी । लेकिन यहां पर मैं एकबात अवश्य कहना चाहूंगा आकाश भाई, कि जीवन यदि है, तो किसी मुक़ाम पर भी न ठहरना ही उसकी फ़ितरत है । आपको यह सच्चाई अब स्वीकार कर लेने हेतु खुद को तैयार करना ही होगा । सृष्टि के अपने कुछ नियम होते हैं, और वह हमारे हिसाब से नहीं चलती । सैलाब आते हैं, जलज़ले आते हैं, और चले जाते हैं अपने पीछे तबाही और बर्बादी के इंतहाई मंज़र छोड़कर, परन्तु क्या सृष्टि का अंत हो जाता है ? कदापि नहीं । इंसान को नए सिरे से फ़िर एकबार जुटना ही पड़ता है अपने आशियाने को खड़ा करने के लिये । सिर्फ़ अपने लिये नहीं, बल्कि भविष्य की पौध के लिये । यही सृष्टि का नियम है, इंसान का कर्त्तव्य है, और यही परम सत्य भी है । मेरा विचार है कि स्वर्गीया राखी की आत्मा आपको बड़ी उत्सुकता के साथ निहार रही होगी, कि उसकी क्षणिक भावनाओं में बहने के कारण लिये गए निर्णय की वज़ह से उसके आर्यन की ज़िन्दगी और बर्बाद न हो, बल्कि नए सिरे से आबाद होता देखकर ही उसकी आत्मा को शांति भी मिलेगी, और यही उसके प्रति आपकी सच्ची श्रद्धांजलि भी होगी । यदि आपने इसी प्रकार अपना जीवन उसकी याद में ही काटने का फ़ैसला कर लिया, तो आपका भ्रम होगा कि वह बहुत खुश होगी । उस लोक में पहुंचने वाली आत्माओं की सोच बहुक व्यापक और ईश्वरीय दृष्टियां लिये हुए होती है, हमारे जैसी संकुचित नहीं होती । उसे परम शांति तभी मिल पाएगी, जब आपका घर बस जाए, आंगन में रंगबिरंगे फ़ूल खिलें, और आपके चेहरे पर जीवन की मुस्कान लौट आए । जो सुख वह जीते जी नहीं प्राप्त कर पाई, आपके माध्यम से उन सुखों को देखकर ही उसकी आत्मा प्रफ़ुल्लित होगी, और आत्महत्या करने के अपराधबोध से भी मुक्त हो सकेगी । आज वह दुखी महसूस कर रही होगी कि उसने स्वयं को समाप्त कर आर्यन के भविष्य के साथ अच्छा नहीं किया । उसे इस बोध की छटपटाहट से छुटकारा दिलाने का एकमात्र उपाय यही है कि आप एक अच्छा सा विवाह कर नए सिरे से गृहस्थी बसाकर उसे तृप्त और प्रसन्न करें । मैं इस विषय पर आपके पिताजी से विमर्श करना चाहूंगा, यदि आपकी अनुमति हो तो । टिप्पणी काफ़ी लम्बी हो चली है, मैं उचित समय पर आपसे संपर्क करूंगा । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आकाश जी, आपका प्यार मामूली सांसारिक प्यार नहीं, बल्कि दिव्य और अलौकिक है, वरना आपने आज तक उसी प्यार की माला जपते रहने की बजाय कब का उसे भूलकर किसी और को अपना लिया होता । आपका प्रकरण यह साबित करता है कि आज भी प्यार की भावनाएं उसी तरह शाश्वत और अमिट हैं, जैसी मनु और श्रद्धा के समय थीं । कई मामालों में प्यार का शारीरिक सम्बंधों में बदल पाना आसानी से संभव भी नहीं होता । अब अमेरिका में बैठी किसी लड़की से मिलने के लिये भारतीय लड़के को सात समंदर पार जाने के लिये बाक़ायदे योजना बनानी पड़ेगी । परन्तु यदि प्यार सच्चा है, तो मिलें या न मिलें, भावनाओं से ज़रूर झलकेगा कि दोनों की चाहत में कोई खोट नहीं है । आप का प्यार हर दूरी की मजबूरी से परे और अनोखा प्यार है । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आकाश जी, आप कितने प्यारे इंसान हैं, इसका अंदाज़ा आपके दिल में राखी के प्रति प्यार की अथाह गहराइयों से लगाया जा सकता है । मैं आपको बखूबी पहचानता हूं । दुर्भाग्य तो उस लड़की का है, जिसने अगर थोड़ा भी साहस दिखाया होता अपने वादों के प्रति, तो शायद आप जैसे दुर्लभ प्यार करने वाले इंसान को खोने से खुद भी बच जाती, और आप दोनों के जीवन की बगिया आज भांति-भांति के खुशबूदार फ़ूलों से लदी हुई भी होती । आपने कहीं लिखा था कि आप भी पंडित और उसका खानदान भी पंडित, फ़िर सचमुच कहीं भी कोई समस्या नहीं थी । समस्या रही होगी तो मात्र राखी के फ़ादर इब्राहिम जी की मूंछें, जिन्हें अपना नुकीलापन बेटी की खुशियों से भी अधिक प्यारा था । खैर, आपकी पूरी प्रेमकथा के पश्चात ही किसी निष्कर्ष पर पहुंच पाऊंगा । साधुवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

प्रिय आकाश तिवारी जी, नाराजगी किसी से गुस्‍सा समाज पर। आपकी कहानी यदि प्‍यार की है तो फिर ये गुस्‍सा क्‍यों ? राखी से आप प्‍यार करते थे या हैं राखी आपसे प्‍यार करती थी या है। बस आप साथ नहीं रह सके तो इसी पर नाराज है। राधा- कृष्‍ण का उदाहरण भी देते हैं और फिर दोष समाज को। ब्‍लॉग का नाम भी बेवफाई। किसकी आपकी या किसी और की। पिता होने के नाते राखी के पिता का कदम गलत नहीं था। क्‍योंकि आपने कहीं नहीं लिखा की वे इस तरह के प्‍यार को पसंद करते थे लेकिन आपके मामलें में पसंद नहीं किया। यह दोगलापन नहीं है। क्‍योंकि व्‍यक्ति जब समाज में रहता है तो वह स्‍वयं अपने लिए डर पैदा कर लेता है। इसलिए नाराज या गुस्‍सा होने से अधिक प्‍यार की बंदगी कीजिए। रचना की दृष्टि से Valentine Contest के लिए तीनों रचनाओं में भाव अच्‍छे हैं। अरविन्‍द पारीक

के द्वारा: bhaijikahin by ARVIND PAREEK

आकाश जी, इनकी सेवा में एक दिक़्क़त और है कि आपने जो भी नंबर दिया, मैं कभी आपका फ़ोन नहीं मिला पाया । आपके बधाई संदेश वाले नंबर पर रिप्लाई मारने की कोशिश की तो वह नंबर भी फ़र्ज़ी निकला । आपके इलाहाबाद को पुराने बनारस की हवा लग गई है, जहां पहुंचने वाली हर मोबाइल कंपनी ठगने का काम शुरू कर दे रही है । आपको तो पता ही होगा कि बनारस के नाऊ आधी दाढ़ी खरोंचने के बाद अपना रेट बताते हैं, जब ग्राहक उठकर कहीं और जाने की स्थिति में भी नहीं होता । शायद दाढ़ी पोर्टेबिलिटी की कोई स्कीम आने पर इस समस्या से कुछ राहत मिल सके । वैसे मज़ाक़ की बात अपनी जगह । आपने जो समस्याएं बताई हैं, वह पूरे भारतीय उपभोक्ताओं की समस्या है, और कारण भी वही है यानि कौन दो रुपए के लिये माथापच्ची करे । उपभोक्ता संरक्षण के कानून अच्छे हैं, परन्तु क्रियान्वयन की व्यवस्था लचर । इनके न्यायाधीश जिलापरिषद के अध्यक्ष की भांति आँनरेरी होते हैं, और हमारे उपभोक्ता भी मात्र एक लकड़ी मार देने वाले अंदाज़ में ही केस ठोंकते हैं । न्याय मिल गया तो वाह, नहीं मिला तो भी वाह-वाह । विदेशों में व्यापारियों की पीपली जैसी फ़टती है । क्योंकि वहां बाबा रामदेव के शब्दों में बात-बात पर 'शू' कर देने की प्रथा है, जिससे व्यापारियों की ठगने की हिम्मत नहीं होती । जै राम जी की ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आकाश जी , ये समस्या से तो मै पिछले ४ महीने से परेशान हूँ .. यहाँ में कंपनी का नाम भी लूगी , reliance वाले एक तो उनका tower नहीं होता बात तो किसी से क्र नहीं पते लेकिन हाँ बैलेंस जरुर कट हो जाता है ....... हर महीने ये लोग जॉब अलर्ट की सुविधा आरंभ करके पैसे कट लेते है और हाँ अगर इनकी service के पुरे पैसे मोबाइल में न हो तो आपका बैलेंस minus कर देते है ... हर महीने उनसे बहस करो और इस बार तो शायद बहस करने का बदला लिया गया की दो-दो schemes activate कर दी ......... और बैलेंस तो वापस करेगे नहीं...... यही नहीं कस्टमर केयर आपको सिर्फ दिन में तंग नहीं करते बल्कि नंबर बदल बदल कर रात को भी फ़ोन करके अपनी schemes बताते है .........msg बॉक्स इनके msgs से भरा होता है बस ...... क्युकी किसी और के लिए ये space खाली नहीं रहने देते ....... तिवारी जी ये लोग बस ग्राहक को बेवकूफ बनाते है ....... नंबर बदलने से भी कोई फायदा नहीं होगा क्युकी जिस कंपनी की तरफ लोग ज्यादा जायेगे वहा traffic ज्यादा होने से कॉल ड्रॉप कॉल एंड की परेशानियाँ होगी .......

के द्वारा: roshni

आकाश जी, देरी से प्रतिक्रिया के लिए माफ़ी चाहुगी ..... आपकी कहनी बहुत ही अच्छी है ....असल में ये उम्र प्यार करने की नहीं होती इस उम्र में तो मात्र आकर्षण ही हावी होता है ......तबी तो एक लड़का बिना सोचे समझे अपनी जान दे देता है और लडकी इसे एक मजाक भर ही समझती है ........ प्यार करना बुरा नहीं मगर इस तरह जान देना भी अच्छा नहीं ........... जो लोग किसी के प्यार में पढ़कर ये कदम उठाते है या ये सोचते है की उनकी दुनिया ख़तम हो गयी तो एक बार अपने घर की तरफ भी देखे जहाँ बहुत सरे लोग उसे अपनी जान से भी ज्यदा प्यार करते है ........... सिर्फ एक इंसान के पीछे जान देना कहाँ तक उचित है ......... प्यार से भी जरुरी कई काम है प्यार सब कुछ नहीं आदमी के लिए ..... बहुत अच्छी कहानी

के द्वारा: roshni

आकाश जी........ बेहतरीन विषय उठाया है ... आपने एक बार मेरे मोबाइल पर भी अपने आप ही क्रिकेट अलर्ट एक्टिव हो गया था..... 30 रुपए भी कटे .. और हर ओवर के बाद मेसज आ जाता...... ऑफिस में बार बार व्यवधान होता था...... हालाँकि फोन साइलेंट था पर कंप्यूटर के सामने बैठे होने पर मेसज आने पर कंप्यूटर का स्पीकर आवाज करने लगता है और कंप्यूटर में भी थोडा स्क्रीन कम्पन करने लगता है....... तो काम में बाधा होने के कारण मैंने कस्टमर केयर में कॉल की ... और बताया की मेरे में ये एक्टिव हो गया है....... तो उसने कहा की जब इसको एक्टिव करने के लिए फोन आया होगा तो आपने कोई नम्बर दबाया होगा....... मैंने कहा मैंने कोई नंबर तब नहीं दबाया........ तो वो बोला की किसी बच्चे ने दबाया होगा........ फिर मैंने उसको बोला की भाई.... पहले तो मैं यहाँ मैं अपने मित्रों के साथ रहता हूँ........ तो बच्चे के दबाने का कोई प्रश्न ही नहीं........ और रही बात मेरे दबाने की तो भाई हम इतने पढ़े लिखे तो है ही की उसकी कही बात समझ कर कोई बटन दबाएँ या न दबाएँ....... मैंने उसको बोला की मैं ३० रुपए कटे की शिकायत नहीं कर रहा हूँ....... मैं बस इसे डिएक्टिवेट करवाना चाहता हु...... तो वो बोला की सर ये तो बहुत अच्छी सर्विस है फिर क्यों हटाना चाहते हैं......... तो मैंने उसको बोला की भाई आपको अच्छी लगे तो आप अपने में लगा लो............ उसका पैसा भी भले मेरे में से काट लो पर प्लीज़ मेरे में से हटा लो....... वो फिर भी बहुत देर तक इस सर्विस के गुण गता रहा......... और हार कर मुझे फोन रखना पड़ा और फिर लोकल ऑफिस से ये सर्विस हटाई.............. तब तक कोई चारा नहीं था....... पर अब नंबर बदले बिना सर्विस प्रोवाइडर बदलने की सुविधा आने के बाद मुझे अपने इस तरह के शिकायत से मुक्ति मिलेगी.........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

आकाश जी......... वास्तव मे युवा पीढ़ी फिल्मों के बनाए हुए भ्रम जाल मे फंस चुकी है............ अब आधुनिक होने के लिए प्रेमी / प्रेमिका होना अनिवार्य शर्त है.......... यहाँ सबसे बड़ी समस्या ये है की हर लड़का/ लड़की अपने को अपवाद मान लेते हैं..... यदि आप किसी लड़के को इस घटना के बारे मे बताएं......... तो वो कहेगा की नहीं मेरी प्रेमिका ऐसी नहीं है........ या मेरा प्रेमी ऐसा नहीं है....... आज के ये युवा अपने प्रेमी प्रेमिका को अपने आस पास के मित्रों / सहेलियों मे बड़ी अच्छी छवि के साथ प्रस्तुत करते हैं.....ओर इसको अपने सम्मान का विषय बना लेते है........ ओर जब धोखा खाते है तो कहीं उसको उस झुठे अभिमान को ठेस लगती है...... ओर वो आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते है......... एक मार्मिक घटना के माध्यम से एक सार्थक संदेश देने के लिए आप बधाई के पात्र हैं.............. बधाई........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

आकाश जी, काफी दिन बाद आपकी पोस्ट पढी, तो प्रतिक्रिया देने से अपने आप को रोक नहीं पाया........इससे पुर्व.....खच्चर... पर प्रतिक्रिया दी थी, आपको पसंद नहीं आयी थी....................खैर.................... बहुत ही उम्दा विषय है............... काल्पनिक कहानी के माध्यम से आपने भावनाओं को स्याही दे दी.................. इस प्रकार का प्रेम पागलपन है............ क्या उस लड़के 'राज' को अपने माता-पिता का ध्यान आत्महत्या करते समाया नहीं आया, जिनका वो इकलौता पुत्र था, जिन्होंने स्वयं फटे और कम कपड़ो में रह कर भी उसे शहर में पढने भेजा.................. यद्यपि ये आजकल की आम बात हो गयी है........... आजकल के युवा विपरीत लिंग के आकर्षण को प्रेम का नाम देते हैं...........प्रेम तो निष्काम होता है..............यदि 'राज' की प्रेमिका उसे छोड़ कर चली गयी थी तो वह अपने प्यार को अपने माता पिता की और मोड़ सकता था................किन्तु उसने आत्महत्या का ''कायराना'' रास्ता चुना.................. तिवारी जी बहुत-बहुत धन्यवाद् ऐसा ज्वलंत प्रश्न उठाने के लिए......... आदित्य www.aditya.jagranjunction.com

के द्वारा: aditya

आकाश जी .. आपको आश्चर्य हो रहा होगा इस पर लेकिन मुझे इस्पे ज्यादा आश्चर्य नहीं हो रहा है कांग्रेस की सरकार और उनके मंत्रियो के बयानों को सुनते सुनते हमें ये आदत हो जानी चाहिए की कुछ भी हो सही हो सकता है.... महंगाई की बात हो या फिर अनाज सड़ने की ,,, आतंकवाद का मुद्दा हो या कश्मीर का .... गरीबो की बात हो या युवराज की इस सरकार के लोगो के तर्क ऐसे मूर्खतापूर्ण रहे है जिन्हें सुनकर आप सर पीटेंगे और खुद से सवाल करेंगे की ऐसे बेहूदो को क्यों संसद पंहुचा दिया ..... अगर चिदंबरम साहब को हटा दे तो पूरी सरकार नकारा नेताओं की फ़ौज दिखती है जिनका एकमात्र मकसद चारण परंपरा का निर्वहन करना है... अब अगर उनके अधिकारियों ने महंगाई की वजह गरीबो द्वारा अधिक भोजन करना माना है (जिनमे २५ करोण हर रात भूखे पेट सोते है ).. तो शायद कुछ होगा ही .............. बढ़िया लेख है आकाश जी सटीक सवाल है... बस जवाब गुम है ........

के द्वारा: nikhil

आकाश जी विलम्ब से प्रतिक्रिया दे रहा हु क्षमा करे..... बुर्का इस्लामी संस्कृति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है... इसमें कोई दो राय नहीं है की हर व्यवस्था के कुछ नफे नुक्सान होते है ... हम न तो बुर्के को पूरी तरह से लाभकारी ही ठहरा सकते है न तो एकदम से नुकसानदायक कह सकते है.... बुर्के की वजह से कई समस्याए सामने आती है जिनमे कुछ तो बेहद गंभीर है जैसे की सुना गया था की मतदाता पहचान पत्र बनवाने के लिए या वोट डालने जाते समय कई मुस्लिम महिलाओं ने बुर्का हटाने का विरोध किया अब भला बुर्के में कोई फोटो कैसे ली जा सकती है या मतदाता की पहचान कैसे की जा सकती है ? कुछ समस्याओ की तरफ आपने भी इशारा किया .. जो बिलकुल सही है हम और आप उसे देखते है...समाज में .. लेकिन केवल इन अधारो पर हम बुर्के को गलत नहीं करार दे सकते है... ठण्ड में शहर के वीरान रास्तो में या पार्को में दिन में लकड़े लडकिया सर से पैर तक कपड़ो में लदे हुए अश्लील हरकतों में मस्त रहते है .., बुर्के को केवल इन तर्कों के आधार पर ख़ारिज नहीं किया जा सकता है ... लेकिन इस्लामिक संस्कृति के एक अंग के रूप में बुर्के की मान्यता ज्यादा मजबूत दिखती है..... यहाँ मै एक बात और जोड़ना चाहता हु.... आज हम देख रहे है की कुछ इस्लामिक देश बुर्के से महिलाओं को बाहर ला रहे है और आधुनिकता का लबादा ओढ़ रहे है... और अगर ये समय की मांग है तो मेरा विश्वाश है की की इस्लामिक संस्कृति के जिस पड़ाव पर बुर्का अप्रासंगिक हो जायेगा वह स्वतः ही हट जायेगा.... आधुनिक विश्व मानवीयता की बात करता है जहा स्त्री और पुरुष की समानता की बात हो रही है ऐसे में जो भी चीजे अप्रासंगिक होंगी वे हट जाएँगी ..एक बात कहाँ चाहूँगा की मैंने स्वयं ऐसी कई महिलाओं को देह्खा है जो अपने कार्यस्थल पर बुर्के में जाती है और वह पहुच कर उसे उतार कर अपना कार्य करती है फिर उसे पहन कर वापस आती है जाहिर है उन्हें जरुर इसमें कुछ लाभ दीखता हो शायद सड़क पर चलते में किसी की गन्दी निगाहों से न टकराने का लाभ या फिर गर्मी में सूरज की तेज आंच से सुरक्षा .. या ठण्ड में चेहरे की नमी बनाये रखने का लाभ या कुछ और ....हा कई बार ये खटकता है की यदि महिला बुर्के में है तो शायद वह कमजोर है ,, दबी हुई है शोषित है ,, अशिक्षित है या पश्चिम की तुलना में हीन है .पर वास्तव में पूरी तरह ऐसा नहीं है .... बुर्का कही से भी मुस्लिम महिला के लिए हीनता या मौकापरस्ती या ओट में मनमानी .का प्रतीक नहीं है.....ऐसा केवल हमें लगता है... गलत कामो के लिए हमें रास्ते मिल ही जाते है.. बढ़िया लेख है आकाश जी इसपर काफी चर्चा हुई है आपको शुभकामनाये.....

के द्वारा: nikhil

आकाश जी सच्चाई को हम समझ रहे है लेकिन आप खुद सोचिये अगर आप किसी धर्म विशेष के परिधान पर कोई कानून बनाने की बात कर रहे तो ये समस्या का कोई समाधान नहीं है .आपने खुद कहा "शराब पर प्रतिबन्ध लगाने से शराबी शराब peena band नहीं karega " तो waisay hi बुर्के या हेलमेट या किसी पर सवाल उठाना समस्या का समाधान तो नहीं है . आख़िरकार आपकी और हमारी परेशानी तो चोरी ,आतंकवाद और अश्लीलता ही है न ....तो वोह चाहे किसी की भी आड़ में हो या किसी भी रूप में हो सिर्फ बुर्का ही क्यों ?कड़ा कानून अपराधो पर होना चाहिए न कि अपराध किसकी आड़ में हो रहे है उस पर ...........बुर्के पर कोई कानून बना भी दिया जाये तो हो सकता है जो अपराधी बुर्के कि आड़ में जो अपराध करते थे वोह कोई और रास्ता निकाल लेंगे ..इससे वोह अपराध तो ख़तम नहीं होगा न जिसका आपने और बहुत से साथियों ने जिक्र किया ..अफ़सोस इस बात पर है कि ज़्यादातर लोगो कि तकलीफ चोरी ,आतंकवाद और अश्लीलता पर न हो कर बुर्के पर है और कानून भी उसी पर बनाने कि बात करते है ....जैसा कि कुछ साथियो ने दुकानों पर होने वाली चोरियों का ज़िक्र किया और ये saabit किया कि दूकानदार कि समस्या चोरी नहीं बुर्का थी मुझे उस दूकानदार कि अक़ल पर भी तरस आता है जिसने चोरी के बाद बुर्के वाली महिलायों का आना निषेध कर दिया ..कल कोई कोट या शर्ट या साडी पहन कर चोरी करेगा तो वोह दूकानदार उनका आना भी बंद करवाएगा क्या ? जहा तक मुझे याद है बुर्के में चोरियों कि घटनाये एक कट्टरवादी संगठन के नेता के भाषण के बाद अचानक बढ गयी और तलाशियो का सिलसिला भी .....अब तो हद ये हो गयी कि कोई मनचला या मुसलमानों के खिलाफ हीन भावना से ग्रस्त व्यक्ति चेहरा देखने के लिए या अपमानित करने के लिए चोरी का इलज़ाम लगाने लगा ..ऐसे कई कई उदहारण भरे पड़े है जिसमे सिर्फ छूने के लिए कुछ मनचले लोग महिलायों पर चोरी का इलज़ाम लगा देते है .आपके देशप्रेम और अपराध के खिलाफ सोच सराहनीय है आपके ब्लॉग का मकसद भले ही नेक हो लेकिन साथियो के कमेन्ट से प्रतीत hota है इसकी दिशा धर्म विशेष के परिधान पर जा रही है न कि होने वाले अपराध पर ....फिर भी आपका धन्यवाद् कम से कम अब हमें ये तो लगने लगा है कि चोरी ,आतंक और अश्लीलता के खिलाफ कानून इतना सख्त होना चाहिए कि कोई करने कि हिम्मत न करें अब हो चाहे बुर्के कि आड़ में हो या घूँघट कि आड़ में या खुलेआम हो . aapke dvara vyakt samasayo ka samadhan bhi yahi hai

के द्वारा: azad

आकाश जी मैं आप के ख्यालात की कद्र करता हूँ. लेकिन सहमत नहीं..और यह होना भी है क्योंकि मैं मुस्लिम हूँ. लेकिन यहाँ मेरी असहमति यहाँ मुस्लिम होने के कारण नहीं बल्कि सत्य पे आधारित है..पहले यह बता दूं परदे मैं ना तो चेहरा छिपाना आवश्यक है और ना की काला लबादा ओढना.जिस्म की नुमाइश ना हो, बाल ना खुले हूँ , इतना काफी है और यह घूंघट वाली औरत भी किया करती है. कसे१:मानव बोंम्ब रखना घूंघट मैं भी मुमकिन है. और सर्दियों के कोट और शाल मैं भी. वाराणसी मैं मैंने शाल पहने रिवाल्वर और कटता ले के टहलते भी देखा है. ऐसे मैं क्या शाल पहनने पे सवालिया निशाँ लगा दें. केस २: किसी भी मुस्लिम से पूछ लेकिन कितने भी नकाब मैं औरत हो, यह अवश्य पहचान ली जाती हैं की कौन है. भाई का ना पहचान पाना, ग़लत दलील है. यह असंभव है.. केस ३: हिमेश का बा इज्ज़त , बिना परेशानी के घूम आना बाज़ार , केवल बुर्के के कारण इस बात की पुष्टि करता है बुर्का औरत को भी वैसे ही ग़लत नज़रों से बचाता है.. आज बग़ैर बुर्के की , अधनंगी औरत देख नौजवान , जिसकी शादी नहीं हुई, या तो बलात्कार की तरफ जाता है, या अनैतिक रिश्ते बनाता है या फिर हस्तमैथुन. यह सभी ग़लत है.. अधनंगी औरत ना देखने पे खुद पे काबू करना आसान हुआ करता है. एक पर्दा सौ गुनाहों से बचाता है...

के द्वारा: smma59

आकाश जी| आस्था और संस्कारों से जुड़ी बातों पर प्रश्न नहीं उठने चाहिए| लेकिन उन्हीं संस्कारों की आड़ ले कर ग़लत काम किये जाएँ, अनैतिकता को बढ़ावा दिया जाए, किसी भी प्रकार का कोई अनर्गल कृत्य किया जाये तो वह सर्वथा अनुचित है| सबसे पहले तो एक बहुत प्राचीन उद्धरण देना चाहूँगा, यथा – “अति सर्वत्र वर्जयते|” संतुलन ही हर समस्या का समाधान है| हमें ज़िंदा रहने के लिए खाना ज़रूरी है लेकिन उसी ज़रूरत को हम हद के पार ले जाएँ तो दुष्प्रभाव तो होंगे ही| ठीक इसी तरह, जहाँ ज़रूरी हो वहां तक ठीक है, पर सीमा पार नहीं की जानी चाहिए| जैसे कि हवाई अड्डों पर सुरक्षा मानकों के साथ समझौता नहीं होना चाहिए, यदि पहचान पत्र बनवाना हो तो बुर्कानशीं हालत में तो यह संभव ही नहीं| हाँ कुछ वैकल्पिक उपाय किये जा सकते हैं जैसे कि महिलाओं द्वारा ऐसे कार्य निष्पादित करवाया जाना| मुनीश जी ने अच्छी व्याख्या दी है अपनी टिप्पणी में| साभार, वाहिद

के द्वारा: वाहिद

तिवारीजी, आदित्यजी, ये बात तो निश्चित ही कही जा सकती है की भारतीय जनता पार्टी का शासन ज्यादा अच्छा था, एक दो उदाहरण के साथ मैं अपनी बात कहूँगा, भाजपा की सरकार से पहले जब मैं गैस लेने जाता था तो हमेशा लाइन लगी रहती थी, बुकिंग के १५ दिन बाद सिलेंडर मिलता था लेकिन भाजपा के समय में सिलेंडर बिना बुकिंग जब चाहो जब मिल जाता था और अब फिर पुरानी हालत है और ज्यादा बुरी है. अच्छी सडकें कैसी होती हैं ये भाजपा के शासन में पता चला वर्ना कांग्रेस तो गड्ढा सड़क बनाती थी और अब फिर से वाही गड्ढे हैं. एक महत्वपूर्ण बात जो मेरे लिए ज्यादा मायने रखती है, मेरा गाँव शहर से बहुत दूर है. यही कोई २० km लेकिन आज़ादी के ५० साल में वहां तक सड़क नहीं बनी भाजपा सरकार आई तो मेरे गाँव की काया पलट गयी गाँव तक पक्की सड़क बन गयी पूरे गाँव में सडकें बन गयीं और अब हालत ये है की सड़क के स्थान पर पत्थर रह गए हैं. पर कहीं कोई सुनवाई नहीं. शिक्षक स्कूल में पढ़ाने आने लगे थे अब फिर गायब. और भी बहुत सी बातें हैं....................अब तो लगता है देश में सरकार ही नहीं है.

के द्वारा: Munish

तिवारीजी, आपका लेख बड़ा ही सार्थक है. उस पर बहुत से कमेन्ट आये परन्तु रशीद जी का कमेन्ट बड़ा ही सार्थक है बाकी कुछ लोगों ने आपके प्रश्नों को समझने में गलती की है या में कुछ ज्यादा अलग सोच रहा हूँ. राजेंद्र रतूड़ी जी आपके लेख की दिशा दशा ही बदल दी, मैंने अभी आज़ाद जी को उनके हेलमेट के उपर किये गए सवाल का जवाब दिया है..... खैर..... मेरा मानना है की बुरका किसी भी सूरत में बुरा नहीं है परन्तु यदि वो कहीं भी किसीभी तरह से राष्ट्र की या समाज की सुरक्षा में अवरोध पैदा करता है तो निश्चित ही इसका समाधान होना चाहिए. यदि आवश्यकता पड़ने पर कहीं पर बुरका हटाना भी पड़ता है या किसी को शक के आधार पर चैक करने की जरूरत आती है तो इसमें किसी धर्म को आड़े नहीं आना चाहिए. .......देश के आगे धर्म को नहीं रखा जा सकता, यदि मुझे मेरे धर्म का कुछ अहित करने से मेरे देश का हित होता हो तो मैं अपने धर्म का अहित करना ज्यादा श्रेयष्कर समझूंगा.

के द्वारा: Munish

आज़ाद जी, तिवारीजी ने जो लिखा उसको थोडा सा गलत समझ लिया, उन्होंने बुर्के की सार्थकता धर्म के परिपेक्ष में नहीं बल्कि राष्ट्र और समाज के परिपेक्ष में पूछी है. एक उदहारण : हमारे पड़ोस में एक jwellers रहते हैं एक दिन कुछ औरतें उनकी दूकान पर बुरका पहन कर आई और सोने की चूडियाँ दिखने को कहा. उन्होंने उनको कई तरह की चूडियाँ दिखायीं और उन्होंने पसंद न आने का बहाना कर उठकर चल दीं. पर जैसे ही उन्होंने चूडियाँ गिनी तो चार चूडियाँ कम थीं, वो उन औरतों के पीछे भागे और उन्हें पकड़ लिया लेकिन धर्म विशेष की औरतें होने के कारण उनकी तलाशी तक नहीं ली गयी और न पूछ ताछ, बाज़ार में हंगामा खड़ा हो गया चूडियाँ नहीं मिलनी थीं नहीं मिलीं....! अब वो अपनी दूकान में बुर्के वाली औरतों को आने ही नहीं देते. में बुर्के को हटाने की बात नहीं करता, लेकिन कहीं पर सुरक्षा की दृष्टि से उसको हटाना भी पड़ता है तो उसमें बुराई ही क्या है, यदि बाज़ार में उन औरतों की तलाशी किसी औरत से ही करवाकर तसल्ली कर ली जाती तो शायद उनका इतना नुक्सान न होता लेकिन, वहां तो इस बात को धर्म विशेष की भावनाओं का अपमान बताया गया. लेकिन अब वो किसी बुर्के वाली को अपनी दूकान में नहीं आने देते तो क्या ये किसी धर्म विशेष की भावनाओं का अपमान नहीं है?

के द्वारा: Munish

प्रिय तिवारी जी, यदि कोई व्यक्ति किसी से प्रेम करता है तो उसके दोष भी उसे गुण के रूप में दिखाई देते हैं. मुझे उम्मीद है की आप मेरी बात को अन्यथा नहीं लेंगे.......................... आपको आपकी प्रिय पार्टी के दोष दिखाई नहीं देते.......................... राजनीति वह चीज है कि अच्छा व्यक्ति यहाँ सफल ही नहीं हो सकता. आदरणीय जोशी जी ने इलाहबाद का विकास किया होगा. लेकिन आप ये सोचिये कि वे छ: साल देश के मानव संसाधन मंत्री रहे, क्या उन्होंने जो इलाहबाद में किया वही विकास क्या उन्होंने कहीं और किया, जबकि वे देश के मंत्री थे, केवल इलाहबाद के नहीं (इलाहबाद के तो वे केवल सांसद भर थे) ये सब वोट पाने के हथकंडे हैं................................ सभी राजनीतिज्ञ एक जैसे हैं...............बस अपनी सुविधा से लिहाज से कोई दक्षिणपंथी है और कोई वामपंथी....................... आदित्य www.aditya.jagranjunction.com

के द्वारा: aditya

आदित्य जी, चलिए मै आपकी बात मानता हूँ की मेरा झुकाव किसी एक पार्टी की की तरफ ज्यादा है मगर क्या आप इस बात को नहीं मानेंगे की भ्रष्टाचार जैसी चीजों की शुरुवात किस पार्टी ने किया,क्या किसी पार्टी के लिए 60 साल कम होते है,आप 6 साल में किसी पार्टी का आंकलन कर रहे है.....मेरे पास बहुत ऐसे तथ्य है जो ये साबित कर सकते है की 6 साल में उन्होंने क्या किया था...मेरे शहर में एक पुल 1992 से 1998 तक एक तिहाई भी नहीं बन पाया था...मगर भारतीय जनता पार्टी के श्री मुरली मनोहर जोशी ने आते ही डेढ़ साल में ही वो पुल पूरा करवा दिया,बहुत से ऐसे काम किये थे की उनके जाने के बाद शहर बहुत अधूरा सा हो गया... क्या भारतीय जनता पार्टी के राज में इतने बड़े घोटाले हुए थे?....नहीं...आंकड़े बहुत है......आजकी हालत ही काफी है कांग्रेस की पोल खोलने के लिए..... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आकाश जी, बहुत ही बढ़िया आलेख. किन्तु कुछ एक तरफ़ा लग रहा है. ऐसा प्रतीत होता है कि आपका झुकाव राजनीति के एक पक्ष की और ज्यादा है..........आप कहेंगे नहीं, किन्तु आप अपने दिल पर हाथ रख कर सोचिये.................राजनीति के हमाम में सब के सब नंगे है. ये बात आपको स्वीकार करनी ही पड़ेगी. मैं किसी को भी दूध का धुला नहीं मान सकता. कोई कम या ज्यादा हो सकता है. छ: साल उन्होंने भी तो राज किया. क्या कोई फर्क आपको नज़र आया. आपकी इस बात से मैं भी सहमत हूँ कि इस देश में भगवा आतंकवाद की बात करना सच्चाई से मुंह मोड़ने जैसा है.............इसे सिर्फ तुष्टिकरण का नाम दिया जा सकता है. और कुछ नहीं. रही बात महंगाई की, यह बात बिलकुल सत्य है कि जितनी महंगाई है, उसे हमेशा बड़ा कर लिखा जाता है. मैं आपको एक उदहारण देता हूँ. आज की तारीख में.....पूरा मीडिया प्याज का भाव 70 -80 रुपये लिख रहा है जबकि अच्छा प्याज 50 रूपये और थोडा कम अच्छा प्याज 35 रूपये प्रति किलो बिक रहा है. आज पैकेटबंद आटा 17 रूपये प्रति किलो बिक रहा है, जबकि मीडिया में आटे का भाव 20 रूपये से कम कहीं नहीं लिखा जाता है. भावनाओं और जोश में आ कर किसी भे संकर नस्ल के व्यक्ति की तुलना किसी पशु से कर देना भी मैं अच्छा नहीं मानता. फिर भी आपके जोश और देश के भविष्य के प्रति चिता को एक क्रांतिकारी प्रणाम! आपका आदित्य www.aditya.jagranjunction.com

के द्वारा: aditya

आकाश जी मैंने आपका लेख पढ़ा और मैं आपसे सहमत हूँ कि बहुत से लोग बुर्के का इस्तेमाल गलत काम करने के लिए करते हैं लेकिन साथ ही मैं यह भी कहना चाहता हूँ कि कोई भी गलत काम करने के लिए चेहरे पे बुर्का होना जरूरी नहीं है बल्कि जब दिलो-दिमाग पर बुर्का पड़ जाता है तभी इंसान गलत काम करता है. बुर्का चूंकि मुस्लिम संप्रदाय से जुड़ा है और इसके पीछे निश्चित ही मुस्लिम संप्रदाय की विशेष धार्मिक और संस्कारिक व्यवस्थाएं हैं और साथ ही यह स्त्रियों की सुरक्षा से भी जुड़ा है, इसलिए हमें इस व्यवस्था का सम्मान करना चाहिए. हिन्दू धर्म में भी तो इस प्रकार की व्यस्थाएं हैं. आज भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश और राजस्थान के कई गाँव में स्त्रियों में लम्बे घूंघट और परदे की व्यवस्था मौजूद है. इस प्रकार के कई रीति-रिवाज हैं जिन पर हम बहस कर सकते हैं पर खुद भी कहीं न कहीं इनका हिस्सा होते हैं. हिन्दुओं में विवाहित स्त्री के लिए सिन्दूर, मंगलसूत्र आदि की व्यवस्था है, अब कोई ये बताये कि केवल स्त्रियों पर ही विवाहित होने का ये टैग क्यों है और पुरुषों के लिए क्यों ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है? बाजार में मिलने वाला सिन्दूर, जिसमें कि ८७% तक शीशा (lead) होता है स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक होता है. पर क्या कोई स्त्रियों को सिन्दूर लगाने से रोक सकता है भले ही इससे उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव पड़ रहा हो? अब रही बात बुर्के के फायदे-नुक्सान की तो मेरा तो मानना है कि आज के परिवेश में तो बुर्का बहुत ही फायदे की चीज है. बुरका स्त्रियों को छेड़-छाड़ और निजता के अलावा प्रदूषण, धूल, सन-बर्न आदि से तो बचाता ही है, साथ ही इससे चेहरे की त्वचा भी सुन्दर बनी रहती है. आपने देखा ही होगा कि आजकल युवतियां (बल्कि युवक भी) धूप, प्रदूषण, धूल, धुंए से बचने के लिए चेहरे पर स्कार्फ, रूमाल आदि बांधते हैं, चश्मे पहनते हैं और हाथों पर कुहनियों तक लम्बे दस्ताने पहने रहते हैं. अगर बुरका धर्म और संस्कारों के साथ-साथ ये सुविधाएँ भी दे रहा है तो सोने पे सुहागा है. इसके अलावा कई सेलेब्रिटी अपने जीवन में निजता के लिए भी बुर्के का सदुपयोग करते है वरना तो लोग उनका घर से निकलना ही मुहाल कर देते हैं. आपने अक्सर पढ़ा या सुना होगा कि करीना कपूर, बिपाशा, कैटरीना कैफ जैसी हीरोइने अक्सर ही बुर्के का उपयोग अपनी निजता के लिए करते है. यहाँ तक कि हालीवुड हीरोइन एंजेलीना जोली भी कई बार निजता के लिए बुर्के उपयोग करती हैं. आकाश जी कृपया बुरा न माने, ये सिर्फ मेरे व्यक्तिगत विचार हैं और इनसे सभी का सहमत होना जरूरी नहीं है पर जैसा कि मैंने शुरू में ही कहा है, बुरे कामो के लिए बुर्के की आड़ का कोई तारतम्य नहीं है. अगर मैंने कुछ गलत कहा हो तो कृपया मुझे जरूर बताएं. धन्यवाद.

के द्वारा: राजेंद्र रतूड़ी

रमेश जी, ये आसाराम/पैलेट बाबा स्वामी नित्यानंद ये है कौन या फिर यूँ कहे की ये है क्या? सिर्फ जनता के द्वारा बनाये गए एक दिमाग के भ्रम है,मैंने तो खुद देखा है की लोग अपने माँ बाप की कभी सेवा नहीं की सास ससुर को इज्जत नहीं दी,मगर एक ढोंगी इंसान की पूजा करते है ये हम और आप है जिन्होंने इनको भगवान का दर्जा दिया है,इनको मानने वाले ऐसे ही सिरफिरे है जैसे बुर्के का पक्ष लेने वाले....अगर दोनों चीजे कहीं गलत पायी जाती है तो दोनों का विरोध करना चाहिए ...अब अगर मै हिन्दू हूँ तो क्या अपने धर्म से जुड़े गलत लोगों की निंदा नहीं करूँगा...मेरे लिए सिर्फ देश है..बाद में और कुछ...आपकी जानकारी के लिए बताना चाहूँगा.. की आसाराम बापू की पूजा के चक्कर में मेरा मेरे चाचा चाची से अनबन है..क्योंकि वो अपने सास ससुर माँ बाप की पूजा नहीं करते और ऐसे इंसान की पूजा करते है जिसके उप्पर सांसारिक मोह माया के कई मुकदमे दर्ज है आप शायद अपनी बात को खुलकर कहना पसंद नहीं करते......अगर कोई चीज गलत है और मैंने उसपर कुछ लिख दिया तो आप उस प्रश्नों को काटने के बजाय धर्म की बात पर उतर आये....बात तो कपडे की थी न.. अगर आपको मेरी बातें बुरी लगी हो तो क्षमा कीजियेगा.. आकाश तिवारी .

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आकाश भाई !! यदि किसी के मन में कोई सवाल उठे तो उसको ठन्डे दिमाग से सोचना और समझना चाहिए और अगर बात सच है तो सुधार करना चाहिए और सवाल उठाने वाले को धन्यवाद देना चाहिए !! हो सकता है आप के ब्लॉग को पढ़कर किसी लड़की को शर्मिन्दिगी हो और वह बुर्के की आड़ में गलत काम करना छोड़ दे तो फिर तो आप बधाई के है , क्या यह समाज की सेवा नहीं होगी मेरा मानना है की आवेश में आने से बेहतर आत्ममंथन होता है,, कमिया और बुराइया हर जगह है और हमें जितना हो सके इसको कम करना चाहिए !! मैं बुर्के का और उसके उद्देश का जिनता समर्थक हूँ उसके दुगना बुर्के की आड़ में किये जाने वाले गुनाहों का विरोधी !! राशिद http://rashid.jagranjunction.com राशिद http://rashid.jagranjunction.com

के द्वारा: Rashid

राशिद जी, मुझे अपने इस पोस्ट पर आपकी प्रतिक्रिया की बहुत अपेक्षा थी..आज पूरी हुई...आपने अपनी बात को बेबाक कहा और वही कहा जो आप कहना चाहते थे..जागरण ब्लॉग पर सबको अपनी बातें कहने और रखने का पूरा हक़ है फिर क्षमा किस बात के लिए..... आपने बिलकुल सही उदाहरण दिया मै आपके उदाहरण से पूरा इत्तेफाक रखता हूँ..मगर क्या आप इस बात को नकार सकते है की "बुर्का" आजके वक्त में इकदम सुरक्षित है...मै एकबात कहूँगा कृपया बुरा मत मानियेगा मै एक ऐसे एरिया में रहता हूँ जिसके बगल में बहुत बड़ा मुस्लिम एरिया है मैंने 10 में से 6 लड़कियों को बुर्के की आड़ में गलत काम करते हुए देखा सुना है...इसे हम निरक्षरता से भी जोड़ सकते है मगर आप इसबात को भी मानिए की जब लड़की को ये डर ही नहीं की कोई उसको पहचान लेगा तो वो अपने मन का सब कर रही है...बुर्के की आड़ में चोरी तो एक बहुत ही आम बात है,बुर्के की आड़ में न जाने कितने शर्मनाक काण्ड हो रहे है..मैंने बुर्के पर प्रतिबन्ध की बात बिलकुल नहीं बोली मगर मेरा सिर्फ इतना ही कहना है की क्यों न आपके ही धर्मगुरु इस समस्या को गम्भीरता से लेते हुए कोई हल निकाले जिससे आपका कौम और हमारा देश दोनों दुरुस्त रहे.. आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आजाद जी, आपने बहुत ही अच्छी बातें कही मै आपके साथ हूँ..जिस तरह देश और धर्म दोनों मेरे अपने है ठीक उसी तरह से मै अपने माँ और बाप दोनों का बच्चा हूँ..मगर मै आपसे ये पूछूँगा की जब कभी किसी घर में माँ या बाप की किसी गलत काम के वजह से कुछ बुरा होने लगता है तो क्या हम होने देंगे या उसमे सुधार करेंगे..जब बाप दूसरी औरत की तरफ झुकने लगता है तो क्या बच्चा खड़ा होकर तमाशा देखेगा या फिर बाप को सही लाइन पर लाने की कोशिस करेगा...बाप बदलता नहीं मगर समय के साथ उसके व्यवहार और विचार बदल जाते है जिसको समय के साथ समझना पड़ता है तालमेल बिठाना पड़ता है...एक ऐसे रास्ते को खोजना पड़ता है की माँ बाप दोनों साथ बने रहे और घर परिवार को कोई नुक्सान न हो... आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

sabse पहले to पिछले कमेंट्स में over रेअक्ट करने के लिए माफ़ करें .............आपके प्रश्नों के उत्तर पहले ही कमेन्ट में दे चूका हूँ .उत्तर ये था कि " अगर कोई किसी सही चीज़ का गलत इस्तेमाल करें तो इसका मतलब ये नहीं है कि उस सही चीज़ पर प्रतिबन्ध लगा देना चाहिए " .... आप हेलमेट के बारें में क्यों नहीं ऐसा सोचते ? chaliye आप ही का केस १ लेते है ....वहा कुछ होने कि sambhavna थी मैंने उदाहरन दिया रास्त्मंडल खेलो का वह तो हुआ है न और अभी तक bike स्वaर पकड़ में भी नहीं आये . कई नामी लोगो कि हत्या हेलमेट धारण किये हुये लोगो ने कि ... और बहुत si बैंक डकैती भी हेलमेट कि आड़ में हुयी है न सिर्फ हमारे देश में बल्कि विदेशो में भी .. केस २ ..देश के कई शहरो में bike पर पीछे बैठने वाले के लिए भी हेलमेट अनिवार्य कर दिया गया है और कई उदाहरन है जिसमे लड़के कि गर्लफ्रेंड बुर्के कि जगह हेलमेट या किसी कपडे का इस्तेमाल करती है ...और कोई भी बाप या भाई हेलमेट या मुंह पर कपडा लपटी अपनी बेटी या bahan को नहीं पहचान सकता केस ३ ... आपने terminator के हीरो अर्नोल्ड का नाम तो सुना होगा वोह bike का दीवाना है और अपने फेन्स कि bheed se bachne के लिए हेलमेट का istemal kerta है हेलमेट कि आड़ में अश्लीलता भी होती है अपराध भी और कई आतंकवादी वारदाते भी हो chuki है ab mujhe तो हेलमेट विश्वव्यापी समस्या लगता है तो क्या इस पर प्रतिबन्ध नहीं होना चाहिए अगर हेलमेट islam dharm se juda hota तो shayad किसी के भी विचार ऐसे ही होते mujhe maloom है किसी भी चीज़ में बुराई khojna या किसी को criticize kernay कि कोई sima नहीं है आप कहते है आप dharm कि baat नहीं कर rahe है to bina islam dharm को samjhe आप बुर्के को भी नहीं समझ सकते एक मुस्लीम महिला जो बुर्का पहनती है उसके लिए बुर्के कि वही अहमियत है जो एक सिख के लिए पगड़ी कि ..

के द्वारा: azad

दुनिया के लगभग हर मुल्क में आधे से ज्यादा अपराध और दुर्घटनाये शराब की वज़ह से होती है कोई उस पर पूर्ण प्रतिबन्ध की बात क्यों नहीं करता ? logo को बुर्के के पीछे होने वाले अपराध और अश्लीलता तो दिखाई देती है लेकिन खुलेआम टीवी पर होने वाले अपराधो और अश्लीलता को लोग entertainment का लेबल लगा कर आराम से परिवार के साथ बैठ कर देख लेते है बड़ी अजीब बात है औरतो के कपडे कम पहन ने को आज़ादी और पूरा ढकने को गुलामी कहा जाता है . ऐसा लगता है मानो हर कोई टार्गेट "मुस्लिम" के कोई mission पर हो ..अमेरिका के साथ मिल कर खुद मेरे ही देश में बेवज़ह के प्रोपगंडा ने हालत ये कर दी है कि अगर musalmaan kisi जुल्म के खिलाफ आवाज भी उठाये तो एक लेबल मिलता है आतंकवादी का और ये काम कोई और करें तो उसे कहते है क्रांतिकारी

के द्वारा: azad

आज कल माहोल ऐसा खड़ा किया जा रहा है की हर बुर्के वाली महिला के बुर्के के पीछे gulam , आतंकवादी और oppressive माहिला खोजी जाती है और हर दाढ़ी वाला आतंकवादी नज़र आता है मानो दुनिया के सारे बुरे कामो की वज़ह musalman और उनके रीती रिवाज़ ही हो .... अगर आप चंद बुरे कामो को वज़ह बता कर हर एक मुस्लमान को usi श्रेणी में रखेंगे तो टकराव lajimi है मेरे पास भी एक उदहारण है हम जब कॉलेज में थे वहा पर लडकिय भी थी कॉलेज छूटने के बाद हॉस्टल में लडके किस तरह हर एक लड़की के उन् अंगो का किस तरह बखान kertay थे शर्म आती है और क्या क्या मंसूबे ............................खैर हमे इस बात से कोई matlab नहीं है कि कोई हिन्दू या ईसाई लड़की क्या पहने और क्या न पहने .... burqa या hiaab muslim महिलायों का हक है जो अपनी मर्जी से पहनती है आप कैसे बेतुके उदहारण दे कर उनका हक छीन सकते है ...मुसलमान quraan को khuda की किताब मानते है और उसमें बदलाव करने का हक खुदा के अलावा किसी को नहीं है

के द्वारा: azad

आज किसी भी विषय पर इस्लाम या मुस्लिम वर्ड जुड़ गया वह लोगो को बुराई खोजने की आदत हो गयी है . aakash जी आपके मन में ये क्यों नहीं आया क राष्ट्र मंडल खेलो क दौरान bike पर सवार लोगो ने हेलमेट लगा कर हमला किया था तो क्यों न हेलमेट पर बैन लगा दिया जाये . बहुत से अपराध हेलमेट की आड़ में भी होते है आपके शहर का तो पता नहीं पर हमारे शहर में ज्यादातर लडकिया(धर्म विशेष की नहीं ) प्रदुषण की वज़ह से मुंह और सर पर एक बुर्के टाइप kapda बाँध कर चलती है क्यों न उस पर भी बैन लगा दिया जाये . आतंकवादी हेलमेट और उस टाइप का कपडे का भी इस्तेमाल कर सकते है और रही बात औरतो की आज़ादी और इज्ज़त की तो आपको अफ्गानिस्तान, अरब या किसी दुसरे मुस्लिम मुल्क को देखने से पहले अपने ही देश में घरेलु हिंसा और बलात्कार के केसेस पर गौर केर लेना चाहिए और अगर ये न हो सके तो सबसे ज्यादा खुलेपन के हिमायती अमेरिका और ब्रिटेन में बलात्कार और घरेलु हिंसा के केसेस पर भी sochna चाहिए ..... आपको लगता है सिर्फ बुर्का उतार देने से महिलाये सब कुछ पा लेंगी .. कोई भी महिलायों की आज़ादी और हक की व्यापक सोच नहीं रखता (मुस्लिम भी )... बस किसी धर्म विशेष के नियमो पर सवाल उठाने का कह दो बड़े बड़े दार्शनिक निकल आयेंगे अगर कोई किसी अच्छी चीज़ का गलत इस्तेमाल करता है तो इसका मतलब ये नहीं उस अच्छी चीज़ पर बैन लगा दो ...सबसे ज्यादा क़त्ल तो बन्दूक और चाकू से होते है हम उन् पर बैन नहीं लगाते क्योकि वोह सुरक्षा और दैनिक ज़रुरतो के लिहाज़ से ज़रूरी है ...

के द्वारा: azad

भाई आकाश जी, आपने तो मेरी सारी मेहनत पर ही पानी फ़ेर दिया । बुर्क़े पर इतना अच्छा उदाहरण दिया, हीरो ने बुर्क़े का फ़ायदा उठाते हुए आशनाई की पींगें बढ़ाईं, गाने गाए, अपनी महबूबा को उड़ाकर ले जाने में क़ामयाब रहा, और कैसा उदाहरण दूं, आप ही बताइये । किसी ने एक भी उदाहरण नहीं लिखा सिवाय मेरे, मेरे भी आपने सब धान बाइस पसेरी जोखते हुए मुझे भी उसी में लपेट दिया । खैर, मैं आप और राजकमल जी से प्यार करता हूं, इसलिये दिल तुड़वाने के लिये भी तैयार हूं । आपका हर सितम सर आंखों पर । आगे का हाल सुनिये । हीरो हीरोइन को लेकर मेले में पहुंचता है, और खलनायक प्राण साहब भी पीछा करते हुए वहीं पहुंचते हैं । ज़ाहिर है बुर्क़े वाली पुड़िया अधिक देर तक चलने वाली नहीं थी । हीरो नया रास्ता निकालते हुए पंजाबी जाट मार्का कपड़े पहनकर नया भेष धारण कर लेता है, जैसा कभी-कभी राजकमल जी भेष बदलते रहते हैं । दाढ़ी-मूंछ भी चिपका लेता है । हम फ़िल्म देखने वाले पहचान जाते हैं कि हीरो ही है, परन्तु प्राण साहब नहीं पहचान पाते । फ़िर एक कोरस सांग होता है - 'हाए रे हाए, यही जज़्बात, रहे दिन रात, तो फ़िर क्या बात मेरी जां बल्ले-बल्ले - ओए होए होए होए होए होऽए' । फ़िर कहानी आगे बढ़ते हुए अपने अगले मुकाम पर पहुंचती है । अब और क्या बताएं, अगर आप बोर न हो रहे हों तो मेरे पास बुर्क़े वाली कुछ और कहानियां भी तैयार हैं, जैसे जानी वाकर ने मेरे हुज़ूर फ़िल्म में कैसे बुर्क़ा पहन कर फ़्लर्ट करते हुए कन्याओं की चप्पलों और सैंडलों का स्वाद चखा था, आदि-इत्यादि । जैसा कहियेगा, मैं इसी स्थान पर पुन: मिलने के लिये तैयार रहूंगा । खुदा हाफ़िज़ ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आकाश जी इस मुद्दे पर हम भी कुछ लिखना चाहते थे ! चलिए यहीं लिखते है., फिर कभी अपने लेख में भी शामिल करेंगे ... हमारी इच्छा महिलाओ की freedom पर विचार देने की थी वो भी मुस्लिम महिलाओ पर , कई बार हमे लगा है की मुस्लिम महिलाओ पे बहुत ज्यादा प्रतिबन्ध लगे रहते है और उनको ये सब स्वीकार्य है , उनको कोई समस्या नही है ऐसा बहुत से मुस्लिम कट्टरपंथी मानते है ! बुर्के का logic यह दिया जाता है की इससे वो लोगो को अपनी तरफ आकर्षित नही कर सकती और ये ही सही है पर अगर उनके मन में भी ये ही कुछ विचार है तो ये बताइए के ज्यादातर बुर्कानशी महिलाये व युवतिया अपने आँखों को क्यों इतना सजाती है 'क्योकि उन्हें भी सुन्दर दिखना है' हमारा मानना है की इस में क्या बुराई है ? हर व्यक्ति को पूरा आधिकार है अपने गुणों को निखारने का ! जब डिजायनर बुरके बाज़ार में आये तो क्यों इतने बिके क्योकि उसकी मांग महिलाओ में इतनी थी, इन सबके पीछे उनका अच्छा व सुन्दर दिखने की चाह छिपी थी ! बुरके की फिटिंग से पता चल जाता हैकि वो भी आकर्षक दिखना चाहती है ! हमारी एक मुस्लिम दोस्त hard perfume का प्रयोग करती थी इसके पीछे का कारण वह स्वयं बताती थी की ताकि आस-पास के लोगो को यह पता चले की इस में एक young girl है न की एक महिला ! रही बात महिला बुर्के के दुर्प्रयोग की तो ऐसा हमने व हमारे कई साथ के लोगो ने दुकानों पे सामान चोरी करके बुरके में छिपाते देखा है तथा पकडे जाने पर वो बुरके में तलाशी को एक धर्म विशेष पर अत्याचार बताने लगती है !

के द्वारा: Mala Srivastava

क्या बात है कि कुछ अलग अंदाज़ में बदले -२ से मेरे हजुर नज़र आज आते है .... आकाश जी आपने एक बेहतरीन मुद्दा बहुत ही सही तरीके से उठाया है .... भारत में भी मुसलमान औरते बुरका पहनती है .... और बुरी नीयत वाले तो पैरों को देख कर ही मुखड़े कि रंगत का अंदाज़ा लगाते रह जाते है .... सभी मुसलमान बुरे नहीं है ....हरेक चीज कि लाभ और हानियां तो होती ही है... अगर आप का ज़न्म एक मुस्लमान परिवार में हुआ होता तब आप का क्या कदम और सोच होती ... मैं तो तब शायद अपनी बहन को एक तो क्या लाख परदे में ही देखना पसंद करता .... अपनी शादी के बाद उसके शौहर कि जो मर्ज़ी होती तब वोह वैसा ही करती ... मुसलमानों में निरक्षरता है ..गरीबी है , धार्मिक कट्टरता और किसी हद तक अंध विश्वाश भी है ... क्योंकि सभी बंगाली जादू वाले आपको मुसलमान ही मिलेंगे ज्यादातर .... इनकी बाकी कि समस्याए सुलझाए बिना , इनका जीवन स्तर उठाये बिना कुछ भी कहना बेमानी है

के द्वारा: rajkamal

आकाश जी, मैं तो यही सोच कर गदगद हूं कि काफ़ी दिनों बाद आपकी ग़ज़लों से अलग कुछ देख रहा हूं, और वह भी बड़े करीने से सजाकर प्रस्तुत किया है आपने । जहां तक बुर्क़े की बात है, तो इसके धार्मिक पक्ष की कोई जानकारी न होने के कारण कोई समीक्षा तो नहीं कर सकता, लेकिन काफ़ी दिनों पहले 'कश्मीर की कली' फ़िल्म में शम्मी कपूर को 'सुभान अल्ला, हसीं चेहरा, ये मस्ताना अदाएं, खुदा महफ़ूज़ रक्खे हर बला से - हर बला से' बुर्क़ा पहनकर गाते हुए ज़रूर देखा था । हीरो-हीरोइन दोनों बुर्क़े में थे, और खलनायक प्राण साहब बीड़ी फ़ूंकते रह गए, हीरो हीरोइन को लेकर मेला दिखाने उड़ गया था । यदि देखें तो यहां बुर्क़े का सीधा फ़ायदा हीरो के पक्ष में नज़र आया । बधाई ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आदरणीय श्री शाही जी, आपकी प्रतिक्रिया रक्त के बहाव की रफ्तार को बहुत तेज कर देती है.कुछ साल पहले तक मै लगभग हफ्ते में एक-दो रचना कर देता था...फिर ऐसा वक्त आया की लिखना छोड़ दिया या यूँ कहे की वक्त और माहौल नहीं बनता था....आज आपकी जानकारी के लिए अपनी एक बात शेयर करूँगा..की मेरी लगभग सभी रचनाये जिनको मै लिखा है सभी को मैंने लगभग आधे (1 /२ hours ) में लिखा है..मतलब एक बार हेडिंग लिखा तो आधे घंटे में रचना तैयार......फिर सब कुछ बंद हो गया..लेकिन जबसे जागरण से जुड़ा हूँ फिर वही रंग लौट रहा है...आपलोगों का आशीर्वाद बस यूँ ही मिलता रहे...आप इस प्रतिक्रिया को पड़कर कुछ जरूर कहे तभी मुझे पता चलेगा की आपने पढ़ा या नहीं...

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आदरणीय श्री शाही जी, आपने मुझे याद किया,मेरा ख्याल किया ये जानकार मुझे कितना हर्ष हो रहा है ये केवल मै ही जान सकता हूँ..मै आजकल अपने बिजनेस में बहुत व्यस्त रहता हूँ...सामने सबकुछ रहता है मगर इतनी फुर्सत नहीं होती की कम से कम कुछ खोल के पढ़ सकूँ रात को खाना खाते ही सो जाता हूँ.. मै भावुक जरूर हूँ मगर मुझे भी हर लम्हा जीना आता है सर..अगर घर वालो को मेरा मजाक बनाकर हसने का मौका मिलता है तो मै रोज-रोज मजाक बनने को तैयार हूँ..सर आपलोगों का इस तरह मेरी ज़िन्दगी में इतनी जल्दी जुड़ना होगा मैंने कभी सोचा न था.... और एक बात आपसे कहनी थी.आजकल श्री बाजपाई जी के दर्शन नहीं हो रहे उनका भी हाल चाल मिल जाता तो अच्छा होता.. आपका आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आकाश जी, शायद कुछ व्यस्तताओं के कारण आपकी सक्रियता इधर कुछ कम है, और नेट को नियमित नहीं देख पा रहे हैं । आप चूंकि भावुक और संवेदनशील व्यक्ति हैं, इसलिये आपके ब्लाँग पर आकर संदेश छोड़ना मुझे अति आवश्यक प्रतीत हुआ । आपने शायद राजकमल जी का ताज़ा ब्लाँग 'तीसरी आंख … ' पढ़ा नहीं है, क्योंकि अभी तक उसपर आपकी कोई टिप्पणी नहीं दिख रही । मेरी चिन्ता का कारण भी यही है, जिसके लिये आपसे संवाद स्थापित करना ज़रूरी लगा । दरअसल अपने स्वाभाविक अंदाज़ में अपने इस हास्य-व्यंग्य वाले लेख में शर्मा जी ने आपके इस ब्लाग पर दिये गए जागरण के मैसेज की तुलना एक शिशु-जन्म से करते हुए कुछ चुटकियां ली हैं, जिसपर मज़े लेते हुए मेरे और मिश्रा जी सहित सभी ब्लागर्स ने हल्के-फ़ुल्के हास्य का मज़ा लिया है तथा टिप्पणियों से एक विनोदपूर्ण माहौल की रचना करने में अपना-अपना योगदान किया है । परन्तु आप ऐसा मज़ा लेने नहीं पहुंचे, इसलिये मुझे थोड़ा खटका लगा कि आपके ब्लाग को माध्यम बना कर किये गए प्रहसन का कहीं आपने बुरा तो नहीं माना है? आप जानते ही हैं कि विचारों के टकराव के कारण अक्सर मंच का माहौल थोड़ा बोझिल हो जाता है, जिसकी मरम्मत का कार्य कर हल्का-फ़ुल्का बनाने में शर्मा जी के हास्य-व्यंग्य की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है । जीवन की नीरसता वाले पक्ष को बैलेंस करने के लिये स्वस्थ हास-परिहास एक अनिवार्य तत्व है । आपसे अनुरोध है कि कृपया इस टिप्पणी के उत्तर में, अथवा कहीं भी, आप अवश्य अवगत कराने का कष्ट करें, कि आपने इस परिहास को किस रूप में लिया । ताक़ि यदि कहीं आपकी भावनाओं को कोई ठेस पहुंची हो, तो खेद प्रकट किया जा सके । यदि आपको भी हास्य मज़ेदार लगे, तो अपनी कोई न कोई टिप्पणी उनके उस ब्लाग पर जाकर अवश्य करने का कष्ट करेंगे । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: आर.एन. शाही

के द्वारा: Rashid

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: Manish Singh

आदरणीय श्री बाजपाई जी, आपलोगों की आज्ञा हुई और ये "आकाश शराबी" ने प्रेम रस में डूबी कविता लिख डाली.. अरे मै तो परेशान हो गया था की आपने अभी तक मेरी कविता नहीं पढ़ी...अब इसे मेरा स्वार्थ कहिये या मेरा आपसब से प्रेम अब देखिये श्री शाई जी अभी तक पता नहीं कहा है उन्होंने भी अभी तक खबर नहीं ली...आपसब मेरा उत्साहवर्धन करिए या फिर कुछ भी मगर आप सब की बातें मेरे लिए आशीर्वाद की तरह है..आपलोगों के दिशानिर्देश की इस नवयुवक को बहुत जरूरत है... आपको गजल पसंद आई मेरा काम सफल हो गया...और आपने जो काम मुझे दिया था उसपे भी मै काम कर रहा हूँ...बहुत जल्द पोस्ट करूँगा...जिम्मेदारी बड़ी है बहुत सावधानी से काम करना है.... आपका आकाश तिवारी

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: Ritambhara tiwari

के द्वारा: parulazad

आकाश जी आप अत्यधिक संवेदनशील व्यक्ति हैं । यह कैसे समझ लिया कि आपको गलत भी समझ सकता हूं । मैं आपको एक बहुत बेहतरीन और भावुक इंसान के तौर पर देखता हूं, और यह भी समझता हूं कि आपका हृदय काफ़ी विशाल है । इसी आत्मीयता में अपना हक़ समझ कर आपसे थोड़ी ठिठोली कर मन हल्का कर लेता हूं । आपके ब्लाग पर गानों की लाइनें देना भी मेरी इसी इच्छा का परिणाम होता है । आप जिस रूप में भी यहां रहेंगे, मेरे लिये आकाश जी ही रहेंगे । एक गलती ज़रूर हुई होगी मुझसे, क्योंकि स्वभावत: मैं भी एक प्यार करने वाला ही इंसान हूं । आपमें और मुझमें इतना ही अंतर है कि मैं प्यार को गम्भीर होकर दुख पाने का नहीं, बल्कि हल्के फ़ुल्के ढंग से लेकर इंज्वाँय करने की चीज़ मानता हूं । तभी मज़ा है । आपने जिस प्यार को बहुत भावुकता से लिया, हो सकता है कि मैं होता तो खुलकर बात कर लेता कि हमें साथ चलना है कि नहीं, साफ़-साफ़ बता दो । चलना है तो चलते हैं, नहीं चलना है तो जै राम जी की । मैं चला अपने रास्ते । ऐसा भी क्या कि एक तो मर-मर कर नाम रटता रहे, और दूसरा कहीं दूर जाकर ऐश करे । अगर उसे यही मंज़ूर है तो हम भी किसी से कम नहीं । मैं आपको फ़िर बता दूं कि मेरी हल्की-फ़ुल्की बातों को कभी बहुत सीरियसली लेने की कोशिश न करें । धन्यवाद ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आकाश जी आपने अच्छा छकाया । शीर्षक देखकर दिल में खौलते दूध सा उबाल आया, और पहुंचने पर आपने बर्फ़ वाले पानी का छींटा देकर नीचे बैठा दिया । लेकिन आपकी मजबूरियां जानकर खुद को समझा रहा हूं कि आपने आगे बढ़ने से खुद को रोकने का निर्णय सोचसमझ कर ही लिया होगा । अभी दो चार दिन पहले ही कहीं रोशनी जी की फ़रमाइश देखा था, वे आपसे दूसरा भाग लाने का आग्रह कर रही थीं । आपने उसी जगह अपनी बाध्यता भी बताई थी । लेकिन आज शीर्षक ने अच्छा चरका दिया । चलिये कोई बात नहीं, आपकी दो लाइनें ही काफ़ी कुछ बयान कर रही हैं । और मुझे भी कुछ तो कहना ही होगा -- अगर दिलवर की रुसवाई हमें मंज़ूर हो जाए, सनम तू बेवफ़ा के नाम से मशहूर हो जाए ॥ हमें फ़ुर्सत नहीं मिलती कभी आँसू बहाने से, कई ग़म पास आ बैठे तेरे एक दूर जाने से, अगर तू पास आ जाए तो हर ग़म दूर हो जाए। सनम तू बेवफ़ा के नाम से मशहूर हो जाए ॥ … धन्यवाद । दुर्गापूजा और दशहरे की बधाइयां ।

के द्वारा: आर.एन. शाही

आकाश बंधू आप अपनाने की बात कर रहे हैं ............ जबकि इस कारण मेरे खिलाफ कई लोग हैं......आपकी बात बिलकुल सही है........... वास्तव में हम राय सबको देते हैं पर अमल नहीं करते..... पर मैंने अमल किया और अपील केवल अपने ब्लोग्स में ही करता हूँ,,,,,,, निजी जीवन में नहीं........ क्योकि भैंस के आगे बीन बजने का कोई फायदा नहीं............... और बिन fayde के यहाँ लोग बात समझते नहीं........ निजी स्तर पर कई बार सार्वजनिक स्थल पर धुम्रपान करते लोगों की शिकायत कर मैंने उन पर जुरमाना करवाया. कई बार शराब पीकर गाड़ी चलाते लोगों की शिकायत की .......... और छोटे बड़े हर भ्रष्टाचार के खिलाफ मैंने RTI में आकडे लेकर जमा किये .......... पर आखिर मैं यही समझ पाया हूँ की अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता........ शुक्रिया.........

के द्वारा: Piyush Pant, Haldwani

के द्वारा: Aakash Tiwaari

के द्वारा: preetamthakur

श्रीमान शाही जी नमस्कार, आपकी बात बिल्कुल सही है,मगर जो भी व्यक्ति ब्लॉग को लिखने को आया है उसे भी उसकी जिम्मेदारी का ज्ञान होना चाहिए मैंने भी शुरू-शुरू में ब्लॉग को कई दिनों तक पढ़ा समझा उसके बाद इसको अपनाया.ये हमारा उत्तरदायित्व है की हम जिस चीज से जुड़ रहें है उसका महत्त्व हमारे जुड़ने से कम न हो बल्कि दिन प्रतिदिन बढ़ता ही जाये..मुझे ऐसे ब्लोगरों से कोई शिकायत नहीं है मगर उनको अगर समझ में नहीं आ रहा तो उन्हें उनकी जिम्मेदारी का ज्ञान कराना हमारे आपके जैसे ब्लोगरों का कार्य है,वरना हम लोग ही गलत समझे जायेंगे.क्योंकि हम लोग तो ब्लॉग के पुराने सदस्य हैं और हमें ही इसके महत्व को बनाये रखना है.. आकाश तिवारी

के द्वारा: aAakash Tiwaari

के द्वारा: mayank

अरे आकाश जी आपने कही गलत तो नहीं समझा | मेरे कहने का आशय था, जो भी लोग बदल रहे हैं, या फिर बदलना चाहते हैं, या फिर बदल हैं, वो बदलते रहें, बदल जाएँ क्योंकि हर कण परिवर्तन के नियमों से बाध्य है | लेकिन बदलते वक़्त इतना ख्याल जरूर रखा जाना चाहिए की कुछ इस तरह से की जिस चीज़ से बने हो उसी में बदल जाओ | जैसे पानी से ही बर्फ बनता है , और जब बर्फ पिघलता है तो फिर से पानी बन जाता है | मतलब जिसके वजूद से कोई चोट करने के लायक बनता है, अगर फिर कभी बदलने आये तो उसी समाहित हो जाए जिसके कारण उसे ये विशेषता प्राप्त हुयी है | मैं आपको शिक्षा नहीं दे रहा आकाश जी, अगर मेरी बात से आपको ठेस पहुंची हो तो मैं इसके लिए क्षमा प्रार्थी हूँ .....

के द्वारा: Shailesh Kumar Pandey

श्रीमान खुराना जी नमस्कार छमा चाहता हूँ आपने जो लिखा वो बात मै भी सोचता हूँ और अपने उप्पर लागू भी करता हूँ. परन्तु आप एक बार पुनः मेरे "सेक्स और स्त्री" के दोनों लेख पढ़ें तो आप को पता चल जाएगा की मै क्या लिखना चाहता हूँ,और क्या बताना चाहता हूँ. मै ऐसे बेहुदा हेडिंग से नाम कतई कमाना नहीं चाहता मै तो आप सब को सिर्फ इतना बताना चाहता था की ऐसे हेडिंग को देखकर उसे पढने वालो की शंख्या वास्तव में कितनी होती है और दूसरे लेख में मैंने इसका उल्लेख भी किया है और अंत में मैंने ये भी लिखा है की आइन्दा मै ऐसे हेडिंग को कभी इस्तेमाल नहीं करूँगा. इसलिए सर आप मुझे गलत न समझे और एक बार कृपया कर के मेरे दोनों लेखों को फिर पढ़े .आपके कमेन्ट का इन्तेजार रहेगा.. छमा सहित आपका =आकाश तिवारी=

के द्वारा: Aakash Tiwaari

आकाश जी वह क्या बात है आज अपने लेख लिखा और वह भी बहुत सच्चा और सटीक .. बहुत से लोग मसाल चीज़े पसंद करते है .. दूसरों के जीवन में क्या हो रहा है ये भी हर कोई जानना चाहता है .. पर इसके बारे में अग़र बहस की जाये तो कुछ निष्कर्ष नहीं निकलेगा... आपने देखा होगा कोई पुरष के बार में लेख लिखता है तो साथ है कोई इश्त्री के ऊपर लिख देता है .. और कोई किसी के पक्ष में लिख रहा है और कोई विरोध में ... सब एक दुसरे के बार में ही लिख रहे है आजकल... किसी को अपने लेख के हीरो या hironi बना कर क्या सिद्ध किया जा रहा है पता नहीं.. किसी को कुछ आचे लगे ये बुरा ये उसकी व्यक्तिगत बात है ... अब देखिये जब से अनीता जी न अपना लेख लिहा तब से यहाँ कितने ही लोग उनके पक्ष में और विरोध में खड़े हो गए... और लेख पर लेख लिखा जा रहे है... अगर आप को हमको अच्छा लगे तो टिप्पणी दीजिये वर्ना रहने दे... दुनिया में और भी दुसरे मसाले है उनपे लिखये... अगर कोई अपने बारे में कुछ लिख रहे है तो उन्हें लिखने दीजिये क्युकी ये उनके अपनी मर्जी है ... इस को Issue हम लोग बना रहे है.. और आकाश जी आच्छा लेखन किसी टिप्पणी पर नहीं टिका हो सकता .. और हाँ कर्म करते रहिये फल जरुरु मिलेगा...... अच्छे लेख पर मेरी शुब्कम्नाये

के द्वारा: roshni

पिछले करीब दो हफ्ते के बाद ब्लॉग पर लिखने की इच्छा और हिम्मत कर रहा हूं। मन बेहद क्षुब्ध है। इतने दिनों तक कुछ भी न लिख पाने की यही वजह है। सुबह सोचा कि आज तो मौन तोडऩा ही पड़ेगा, लेकिन आपने मेरे शब्दों को अपनी आवाज दे दी। आजकल बेहद दुषित होता जा रहा है जागरण जंक्शन। न जाने कहां-कहां से लोग अपने ‘महान विचारों’ को लेकर आ गए हैं। रसीला साहित्य लिख कर टॉप ब्लॉगर लिखने की ऐसी होड़ मची है कि अब तो ज्योतिष वालों ने भी इधर का ही रुख कर लिया है। अपनी पहचान छिपा कर भेद भरी बातें कहने वाले लोग न जाने क्यों सार्थक, तथ्यपरक बातें या बहस नहीं कर पा रहे। इसी ब्लॉग पर ऐसे कितने ही नाम हैं जोकि बेहद सधा हुआ और सार्थक लेखन कर रहे हैं, लेकिन उनको मिलने वाली प्रतिक्रिया जीरो होती हैं लेकिन कुछ लोग ऐसा ‘नींबू निचोड़’ लेखन करने में जुटे हैं कि उनके पास दर्जनों की संख्या में प्रतिक्रिया पहुंच रही हैं। कोई युवती अगर ब्लॉग पर लिखने लगी तो लार टपकने लगती है ब्लॉगरों की। हद है। जागरण जंक्शन का गलत इस्तेमाल रोका जाना चाहिए। अगर किसी के पास सुविचार हैं तो शायद तभी उसे यहां आना चाहिए। हमें जागरण जंक्शन को आर्कुट नहीं बनाना चाहिए। जल्द ही मुख्यधारा में लौटूंगा।

के द्वारा: bharatbhushan

के द्वारा: aakashtiwaary

के द्वारा: roshni




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