बेवफ़ाई

जब दिल टूटता है

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"आकाश" लिखना बाकी है......

Posted On: 4 Jan, 2014 कविता में

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बदला था किसी ने फिर मै बदल चुका हूँ,
सवार हो अपनी कश्ती पर फिर मै निकल चुका हूँ,
आगाज़ तो कर दिया है अभी अंजाम बाकी है.
दुनिया के पत्थरों पर लिखना अभी “आकाश’ बाकी है……To
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अरसा गुजर गया निरंतर जागरण पर ब्लॉगिंग किये हुए..सच कहूं तो लिखने कि समझ रखने वाले और लिखे हुए को पढ़कर समझने वालो का कही जमावड़ा है तो वो सिर्फ और सिर्फ जागरण जंक्शन पर ही है,…ऐसा मै इसलिए नहीं कह रहा कि जागरण वालों का प्रिय बन जाउ बल्कि सच बोलने कि जो आदत है उसे छोड़ना नही चाहता…बस लगातार कुछ समय से प्रयासरत हूँ कि निरंतर लिखू मगर शायद किस्मत को ये मंजूर नहीं..मगर जैसा कि आप सब को पता है कि मेरे जीवन में गम का जो दरिया है वो कभी सूखने वाला नहीं है अब वो दरिया उफान पर है ..किस्मत ने ऐसा झकझोड़ दिया है कि मुझे मेरे उन लोगो कि तलाश है जो मेरे गम को मेरी लेखनी से समझ सके..मै अपने दर्द को अपनी कलम से ही बयां करना पसंद करता हु और वही करता रहूँगा..मुझे आज इलाहबाद छोड़े हुए पूरे 21 महीने हो चुके है और अब मै वापस उसी शहर में खुशियों कि तलाश में लौट रहा हूँ और पूरी उम्मीद है कि बस पहुँचते ही दुबारा वही कलम होगी और वही आपका साथ …..बस कुछ दिन और फिर जागरण पर एक बार फिर अपनों के पास लौटकर आउंगा..
एक बार फिर से जागरण परिवार को बहुत-बहुत धन्यवाद जो ऐसे मंच को प्रस्तुत किया जहा हम अपनी ज़िन्दगी लिख सकते है..
=आकाश तिवारी=

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बदला था किसी ने फिर मै बदल चुका हूँ,

सवार हो अपनी कश्ती पर फिर मै निकल चुका हूँ,

आगाज़ तो कर दिया है अभी अंजाम बाकी है.

दुनिया के पत्थरों पर लिखना अभी “आकाश’ बाकी है……

To be continued….

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अरसा गुजर गया निरंतर जागरण पर ब्लॉगिंग किये हुए..सच कहूं तो लिखने कि समझ रखने वाले और लिखे हुए को पढ़कर समझने वालो का कही जमावड़ा है तो वो सिर्फ और सिर्फ जागरण जंक्शन पर ही है,…ऐसा मै इसलिए नहीं कह रहा कि जागरण वालों का प्रिय बन जाउ बल्कि सच बोलने कि जो आदत है उसे छोड़ना नही चाहता…बस लगातार कुछ समय से प्रयासरत हूँ कि निरंतर लिखू मगर शायद किस्मत को ये मंजूर नहीं..मगर जैसा कि आप सब को पता है कि मेरे जीवन में गम का जो दरिया है वो कभी सूखने वाला नहीं है अब वो दरिया उफान पर है ..किस्मत ने ऐसा झकझोड़ दिया है कि मुझे मेरे उन लोगो कि तलाश है जो मेरे गम को मेरी लेखनी से समझ सके..मै अपने दर्द को अपनी कलम से ही बयां करना पसंद करता हु और वही करता रहूँगा..मुझे आज इलाहबाद छोड़े हुए पूरे 21 महीने हो चुके है और अब मै वापस उसी शहर में खुशियों कि तलाश में लौट रहा हूँ और पूरी उम्मीद है कि बस पहुँचते ही दुबारा वही कलम होगी और वही आपका साथ …..बस कुछ दिन और फिर जागरण पर एक बार फिर अपनों के पास लौटकर आउंगा..

एक बार फिर से जागरण परिवार को बहुत-बहुत धन्यवाद जो ऐसे मंच को प्रस्तुत किया जहा हम अपनी ज़िन्दगी लिख सकते है..

=आकाश तिवारी=

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5 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

आर एन शाही के द्वारा
January 8, 2014

आपकी सदैव प्रतीक्षा रही है, और आगे भी रहेगी आकाश जी । और आगे भी रहेगी आकाश जी । और आगे … मंगलकामनाएं !!

ashishgonda के द्वारा
January 8, 2014

बदला था किसी ने फिर मै बदल चुका हूँ, सवार हो अपनी कश्ती पर फिर मै निकल चुका हूँ, आगाज़ तो कर दिया है अभी अंजाम बाकी है. दुनिया के पत्थरों पर लिखना अभी “आकाश’ बाकी है…… श्री मान आकाश जी! उपरोक्त चार पंक्तियाँ ही बहुत सारे अर्थ समेटे हुए हैं, और पूरा आलेख उनमे ही समाहित हो रहा है, बहुत ही शानदार प्रस्तुति…

1sm1 के द्वारा
January 8, 2014

आपका स्वागत है

yamunapathak के द्वारा
January 7, 2014

aakaash jee aap is anupam manch par jald apanee lekhanee ke sath upasthit hon yahee ham sab chahate hain…yah ham sab ke liye jeevan darshan samajhane ka institution hai…. sabhar

jlsingh के द्वारा
January 4, 2014

सुस्वागतम आपका आकाश जी!


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