बेवफ़ाई

जब दिल टूटता है

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ख्वाहिश हम भी रखते है..(आधुनिकता का विशेष रंग)----कांटेस्ट.....

Posted On: 18 Mar, 2014 Contest में

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सब खेल रहे है रंगों से हम क्यों दूर खड़े है,

आज हमारी थाली में क्यों सूखे अन्न पड़े है.

क्या हमने कोई गलती की है या इंसान नहीं है,

शायद इस दुनिया में हम अपराधी बड़े है..



आपस में लोगों को आज हमने हसते देखा है,

घर-घर में बच्चे बूढों को आज हमने सजते देखा है.

फिर क्यों आज हमारे तन पर कपड़े फटे पड़े है,

शायद इस दुनिया में हम अपराधी बड़े है..



बचपन से ही हमने ऐसा सबकुछ होते देखा है,

दिवाली में जले अरमानो को होली में बुझते देखा है.

क्यों हम पर ही दुनिया के सारे दर्द पड़े है,

शायद इस दुनिया में हम अपराधी बड़े है..



रंगों के इस त्यौहार में हम ही फीके-फीके है,

दौलत की इस दुनिया में हम सबके पीछे-पीछे है.

क्यों हर खुशियों की संध्या पर हम ही रो पड़े है,

शायद इस दुनिया में हम अपराधी बड़े है..

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यह रचना मैंने आँखों देखी एक मार्मिक दृश्य पर लिखा था और पूरी कोशिश की की ज्यादा से ज्यादा लोगों तक मेरी बात पहुंचे मगर अफ़सोस हर बार-लगातार मै वही दॄश्य देखता हूँ जो मै होश सँभालने के बाद से देखता आ रहा हूँ और यही दॄश्य पिछले वर्ष दिल्ली में भी होली के दौरान देखा और इस वर्ष अपने उसी चिर-परिचित बस्ती में फिर से वही दॄश्य देख मन व्याकुल हो उठा और सोचा इस रचना को आपसब से पुनः साझा करूँ..शायद कांटेस्ट के माध्यम से ज्यादा से ज्यादा लोगों तक मेरी बात पहुंचे…


आज फिर हमेशा की तरह लोगों से गले मिलना अबीर-गुलाल फेकना रंग डालना..तरह तरह के गानों पर नाचना बहुत मस्ती हो रही थी..मगर कोई ऐसा भी था जो इनसब मस्तियों से दूर था….आज मुहल्ले के हम सभी दोस्त बहुत ख़ुशी -ख़ुशी होली मना रहे थे साथ में मै भी था मगर मेरा मन कही न कही उस जगह पर नहीं था जहाँ सब थे जहा हर्षोल्लास था जहाँ रंग,भंग और वो सभी चीजे जिससे एक साधारण इंसान सारे ग़म को भूल सकता है.. और अंत में मै फिर उसी बस्ती की तरफ गया जहाँ जाने के बाद सारे रंग फीके पड़ जाते है ..पानी के फुहारे आग उगलने लगते है…वही बस्ती जहाँ के लोगों को पता तो है होली एक त्यौहार है जिसमे ढेर सारी खुशियां मनायी जाती है सैकड़ों पकवान बनते है नए परिधान पहने जाते है

..मगर वो मजबूर होते है और अपनी खुशियों का गला हर बार घोंट देते है और अपने बच्चों को अगले वर्ष की झूठी दिलासा देकर वही खाना खिलाकर सुला देते हैं जिसे हम कचड़े में फेक देते है


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अफ़सोस होता है जब ये बातें कानों में गूंजती है की भारत में अमीरों की संख्या बहुत है..भारत में मीडिया स्वतन्त्र है..हाँ ये सच है भारत अमीरों का देश भी है और मीडिया स्वतन्त्र भी तभी तो अमीरों की होली शानदार होती है जिसे हमारे देश की स्वतन्त्र मीडिया कवर करती है..

मगर कभी ये अमीर एक बस्ती की होली का खर्च नहीं उठा सकते और मीडिया इस सच को दुनिया से रूबरू नहीं कराती …एक तरफ जब हम होली के रंग में सराबोर रहते है तो दूसरी तरफ कुछ ऐसे भी है

जो अपने घर में पकने वाली दाल में रंग भी नहीं भर सकते..धिक्कार है मुझे ऐसे समाज ऐसे लोगों


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पर और ऐसे मीडिया पर जिन्हे इनका दुःख नहीं दीखता इनकी तकलीफ नहीं दिखती..मैंने बहुत कोशिश की की अपने मोहल्ले के कुछ लोगों को इकठ्ठा करूँ और त्यौहार पर इस बस्ती के लिए कुछ करूं मगर अफ़सोस ऐसा हो न सका और फिर मैंने अपने परिवार में अपने बड़े भाई और माँ  से अपने दुःख को व्यक्त किया और अगले दिन ही मैंने 3  गुल्लक लाये जिसमे हम तीनो अपनी मर्जी से कुछ न कुछ रुपये रोज डालते और फिर आने वाली दिवाली और होली पर हम 3 गरीब परिवार को कपडे और त्यौहार के सारे सामान भेंट स्वरूप देते और ढेरो आशीर्वाद मुफ्त  में पाते..

जो काम मैंने अपने परिवार के साथ मिलकर किया क्या वही काम हम सब मिलकर नही कर सकते जरा सोचिये कितना अच्छा लगेगा जब सब के सब चाहे वो अमीर हो मध्यम वर्गीय हो या गरीब सब हर त्यौहार पर खुशिया मनाएंगे…..

क्या जो काम मैंने अपने परिवार के साथ मिलकर किया क्या वही काम हम सब मिलकर नही कर सकते जरा सोचिये कितना अच्छा लगेगा जब सब के सब चाहे वो अमीर हो मध्यम वर्गीय हो या गरीब सब हर त्यौहार पर खुशिया मनाएंगे…..

बात दिल से निकली है आप सब से अनुरोध है जरा दूर तक ले जाना….

अगर हम सब मिलकर अगर एक भी गरीब परिवार की त्यौहार की जिम्मेदरी उठायें तो कभी फिर ऐसी कविता कोई रचनाकार नहीं पेश कर पायेगा जो मैंने आज की..

मै अपने सभी पाठकों से अनुरोध करता हूँ की इस दिशा में जरुर कुछ करें…बात दिल से निकली है आप सब से अनुरोध है जरा दूर तक ले जाना….

उम्मीद करता हूँ आप मेरी कविता के माध्यम से गरीबों का दर्द समझ सकेंगे.

*****************

आकाश तिवारी

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12 प्रतिक्रिया

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नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

kavita1980 के द्वारा
April 5, 2014

बधाई हो आकाश जी किसी के गम में आँसू बहाते रहने से अच्छा है किसी रोते को हँसाना; आप और आपके परिवार ने जो किया है या कर रहे हैं ,प्रशंसनीय है और अनुकरणीय भी –आपकी रचनाओं में सबसे अच्छी और वास्तविक –बाकी रचनाओं के लिए कहना चाहूंगी जो चला गया उसे भूल जा –मुश्किल है मगर फिर भी —इस तरह के पॉज़िटिव काम इसमें मदद करेंगे –

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    April 5, 2014

    कविता जी, इस मसले पर मै कुछ नहीं कह सकता.. प्रतिक्रिया हेतु dhanyvaad

Nirmala Singh Gaur के द्वारा
March 24, 2014

आकाश जी आपकी कविता एवं लेख बहुत सत्य एवं ह्रदय स्पर्शी हैं,वास्तव में हमारा कर्तव्य है की त्यौहार हों या सालगिरह,स्वयं के खर्चों में कटौती करके, हमें उस दिन भूंखे गरीबों को कुछ अवश्य देना चाहिए .आप जैसे  संवेदनशील युवकों की इस देश को बहुत ज़रूरत है .बहुत आभार

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 24, 2014

    आदरणीया निर्मला जी, प्रथम बार आगमन हुआ आपका मेरे ब्लॉग पर आगमन और प्रतिक्रिया हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया.. =आकाश तिवारी=

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 24, 2014

    आदरणीय योगी जी, प्रतिक्रिया एवं उत्साहवर्धन हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया.. =आकाश तिवारी=

Madan Mohan saxena के द्वारा
March 21, 2014

ये दुनिया ऐसी ही है ,यथार्थ चित्रण कभी इधर भी पधारें आभार मदन

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 23, 2014

    श्री मदन मोहन जी, आप मेरे ब्लॉग पर आये ख़ुशी हुई.. प्रतिक्रिया हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया..

Ramesh Bajpai के द्वारा
March 21, 2014

रंगों के इस त्यौहार में हम ही फीके-फीके है, दौलत की इस दुनिया में हम सबके पीछे-पीछे है. प्रिय श्री आकाश जी आत्मा को झकझोरती इस पोस्ट ने सिर्फ सच्चाई को प्रस्तुत किया है | आपकी सार्थक पहल लोगो को प्रेरित करेगी ,इसी उम्मीद के साथ

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 23, 2014

    आदरणीय श्री बाजपेयी जी, प्रतिक्रिया हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया..

nishamittal के द्वारा
March 20, 2014

बहुत सुन्दर सच्चाई को अभिव्यक्त करती सुन्दर पोस्ट आकाश तिवारी जी, बचपन से ही हमने ऐसा सबकुछ होते देखा है, दिवाली में जले अरमानो को होली में बुझते देखा है. क्यों हम पर ही दुनिया के सारे दर्द पड़े है, शायद इस दुनिया में हम अपराधी बड़े है..

    Aakash Tiwaari के द्वारा
    March 20, 2014

    आदरणीया निशा जी, आपकी प्रथम प्रतिक्रिया मेरे लिए आशीर्वाद सरीखी है..क्यूंकि मैंने फिर से ब्लॉग पर वापसी कि है..मुझे उम्मीद है कि मुझे एक बार फिर वही पुराना साथ मिलेगा.. प्रतिक्रिया हेतु आपका तहे दिल से शुक्रिया =आकाश तिवारी=


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